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इशाक जी (एक बुजुर्ग की दास्तान)-…….पर कोई बेटी भी ऐसा करती है यह मेरे लिए शर्मनाक था

लेखिका -सुनीता कुमारी पूर्णियाँ बिहार

इंटर कॉलेज ज्वाइन करने के बाद मैंने देखा कि , कॉलेज का कैंपस जितना बड़ा है उतने ही ज्यादा स्टाफ कॉलेज में कार्यरत हैं ।शैक्षणिक स्टाफ के साथ साथ गैर शैक्षणिक स्टाफ भी काफी संख्या में है। मेरे लिए इतने बड़े कॉलेज में पदस्थापित होना बड़े गर्व की बात थी ।
दो-चार दिन बीतते बीतते सभी स्टाफ से मेरा परिचय हो चुका था और मैं सभी को पहचानने लगी थी।

गैर शैक्षणिक स्टाफ में भी मेरा परिचय हुआ कुछ एक दिन में लगभग मैं सबको जाने लगी थी। पूरे कॉलेज की देखभाल करने के लिए लगभग दस से बाहर चपरासी थे ,जिनमें एक चपरासी कुछ ज्यादा ही बुजुर्ग थे, जिसका नाम मोहम्मद इशाक था ।सभी लोग उन्हे इशाक जी कहते थे ।इशाक जी व्यवहार से सरल थे, हर किसी के साथ सरल भाषा में बात किया करते थे। उनका काम था सभी क्लास रूम में क्लास समाप्त होने के बाद क्लासरूम बंद करना।

उनके पास पूरे कॉलेज की चाबी का गुच्छा था ,कॉलेज समय समाप्त होने से पहले वे चाबी लेकर हमारे स्टाफ रूम होते हुए क्लास रूम की तरफ क्लास रूम बंद करने के लिए हर दिन जाया करते थे ,अंत में स्टाफ रूम के करीब आते थे ।
यही सिलसिला लगभग चार सालों तक इशाक जी का रहा ।
मैंने कभी भी उन्हें दुखी या उदास नहीं देखा था ना ही गुस्सा करते हुए उन्हें देखा था ।
वे हमेशा मुस्कुराते हुए सामने आते थे जौली मूड में रहा करते थे ।

मैंने कई एक बार उनसे उनके परिवार में पूछा तो उन्होंने कहा कि मैं और मेरी पत्नी है ,एक बेटी है जिसकी शादी हो गई है।
करीब एक साल पहले दूसरे चपरासी शकील जी को चाबी लेकर घूमते देखा, मैंने अपने स्टाफ रूम में अपने एक सहयोगी से पूछा भी इसाक जी कहां गए?
शकील जी चाबी लेकर घूम रहे हैं?
तब मुझे मुझे पता चला कि इसाक जी को कॉलेज से निकाल दिया गया है ।
सभी लोग अफसोस कर रहे थे। फिर मुझे पता चला कि कोई दूसरा चपरासी जलन वश इसाक जी की शिकायत प्रिंसिपल से कर दी और इशाक जी को नौकरी से निकाल दिया गया ।

इशाक जी के व्यवहार के कारण उन्हें सौ दो सौ हरदिन ऊपरी कमाई भी हो जाती थी ,यह दूसरे चपरासी से देखा नहीं गया और उसने प्रिंसिपल से शिकायत कर दी प्रिंसिपल बिना सोचे समझे , उनके बुजुर्ग व्यक्तितव स्थिति परिस्थित देखे बिना उन्हें नौकरी से निकाल दिया।
चुकि इशाक जी सरकारी कर्मी नहीं थे, उन्हें कुछ एक वर्ष के लिए अनुबंध पर रखा गया था, जो साल दर साल बढ़ाया जा रहा था।
प्रिंसिपल को यह अधिकार होता है कि ,कॉलेज कैंपस की रखवाली के लिए नाइट गार्ड, गेटमैन ,माली या सफाई कर्मी को अनुबंध पर रख सकते हैं ।

इसी का फायदा इशाक जी को मिला हुआ था । इसी का फायदा इशाक जी को निकलवाने के लिए दूसरे चपरासी ने भी उठाया था।
करीब छः महीने उपरांत इसाक जी कॉलेज आए और हमारे स्टाफ रूम की तरफ भी आए ,हम सब उन्हें देखकर खुश हुए। एक बुजुर्ग होने के कारण लगभग प्रत्येक स्टाफ को उनसे लगाव था।
कभी किसी ने उनसे बदतमीजी से बात नहीं की थी।
सब उन्हें बुजुर्गों की तरह ही मान देते थे। इसाक जी को देखते ही सबने उनसे हालचाल पूछा और पूछा कि, कहां रहते हैं ?

इशाक जी ने बताया कि वे शहर के नजदीक रेलवे स्टेशन के बगल में एक रूम लेकर रह रहे हैं ।
हममें से किसी ने एक ने पूछा कि आप अपनी बेटी के पास क्यों नहीं रहते ??
आपकी तो एक ही बेटी है ?तो फिर भाड़े के घर में क्यों।
इशाक जी ने कहा कि नहीं बेटी के घर नहीं रहना चाहते।जहाँ डेरा लिये है वही मैं और मेरी पत्नी मिलकर चाय की दुकान चलाते है।
उस दिन के बाद इशाक जी का कॉलेज आने का सिलसिला जारी रहा । वे सप्ताह दस दिन में आते रहते थे। हर कोई सौ पचास रूपया उन्हें थमा देता था। मैं भी आए दिन उन्हे सौ दो सौ रूपया देती रहती थी।

इशाक जी की आर्थिक स्थिति दिन-ब-दिन दयनीय होती जा रही थी ,इसी क्रम में उनकी तबीयत खराब हो गई।
मैं भी जब भी इशाक जी से मिलती आते थे उन्हें सौ दो सौ दिया करती थी जिससे वह मुझे देखते ही प्रणाम मैडम कहते थे ।
उनका प्रणाम उनके हृदय से निकलकर उनके मुख तक स्पष्ट दिखत था।दिन इशाक जी कॉलेज आए तो उनकी तबीयत काफी खराब थी ऐसी हालत देखकर मैंने उनसे पूछा कि इसाक जी क्या हुआ तो उन्होंने कहा -कि मेरी तबीयत खराब है डॉक्टर ने ऑपरेशन कराने के लिए कहा है

उनके चेहरे की दयनीय स्थिति बहुत कुछ कह रही थी और एक बुजुर्ग की अवहेलना की कहानी स्पष्ट होने लग गई थी ।
मैंने उन्हें सौ रूपया दिया और कहा कि ,सभी स्टाफ से चंदा कर आप अपना ऑपरेशन करा लीजिए।
उन्होंने कहा कि ,कटिहार मेडिकल कॉलेज में मेरा ऑपरेशन होना है उसमें ज्यादा पैसे नहीं लगेंगे बस बाहरी खर्च का पैसा तो ऑपरेशन हो जाएगा।

करीब एक महीने बाद इशाक जी फिर कॉलेज आए पहले से थोड़ा स्वस्थ दिख रहा रहे थे।
मैंने पूछा इशाक जी आपका ऑपरेशन हो गया तो उन्होंने कहा हां हो गया अब पहले से बेहतर महसूस कर रहा हूँ।
फिर हमारे काॅलेज में नए प्रिंसिपल पदस्थापित हुए।इशाक जी को उन्होंने दोबारा से कॉलेज में रख लिया।
मुझे जानकर बहुत खुशी हुई।
इशाक जी से मिली तो वे खुश होते हुए बोले
“हाँ मैडम मैं अब यही कॉलेज में रहता हूं। चपरासी क्वार्टर की तरफ मुझे मालिक ने रूम दिया है।”
उनकी खुशी उनके चेहरे पर स्पष्ट दिखती दिख रही थी ।

अब हरदिन खुश होकर पहले की तरह चाबी लेकर इशाक जी घूमा करते थे ।
मुझे भी तसल्ली हुई कि चलो किसी बुजुर्ग का फिर से भला हो गया है।
एक दिन मैं और मेरे साथ एक मैंम धूप में बैठे हुए थे, इशाक जी आकर बैठ गए। मैंने पूछा इशाक जी आपकी पत्नी और बेटी कैसी है
उन्होंने कहा-कि मेरी पत्नी ठीक है, बेटी के नाम पर उनके आंखों में आंसू आ गए ।
वह आज बहुत कुछ कहने के मूड में थे,

इससे पहले वे कभी भी पूछने पर भी नहीं बताते थे, लेकिन आज कहने लगे-
“मैडम मेरी एक बेटी है ,मैंने उसकी शादी करा दी है,अपने जीवन भर की कमाई मैंने अपनी बेटी पर खर्च कर दिया,जितना भी हो सका मैंने उसके लिए किया, सब कुछ किया जो मुझे उचित लगा ,यहां तक कि मैंने जोड़-जोड़ कर जो रूपया बुढ़ापा के लिए रखा था उससे बेटी का घर भी बनवा दिया ,वह सब कुछ मैंने उसके लिए किया जो मुझे करना चाहिए था ,
पर, मेरी बेटी ने मुझे रखने से इंकार कर दिया ।दो साल पहले मेरी बेटी ने मुझे स्पष्ट रूप से कहा की मैं आपदोनो को नही रखूँगी और मेरी बेटी ने ही मुझे घर से निकाल दिया ।

तब से मैं दुबारा अपनी बेटी की चौखट पर नहीं गया हूं करीब दो साल हो गये मैं अपनी बेटी से मिला तक नहीं हूं ।”
मैं सुनकर अचंभित रह गई यह तो सुना था की आए दिन हमारे समाज में किसी न किसी बुजुर्ग को उसका बेटा और बहू घर से निकाल देते हैं ,

उन्हें ओल्ड एज होम की शरण लेनी पड़ती है।पर कोई बेटी भी ऐसा करती है यह मेरे लिए शर्मनाक था ।
मैं भी बेटी हूँ और अपने माता पिता की देखभाल पूरे मन से करती हूँ चाहे वह सास ससुर हो या मेरे माता पिता।
इशाक जी का जीवन एक ऐसा आइना है जो , यह कह रहा था कि,बेटा या बेटी में फर्क नही होत, एक बुजुर्ग को बेटा भी घर से निकाल सकता है और बेटी भी??

मैं संस्कार या परवरिश की बात नही करूगी बस इशाक जी की कहानी यह बया कर रही है कि, जबतक जीवन रहे प्रत्येक व्यकि को आत्मनिर्भर व आत्मसम्मान के साथ जीना चाहिए जैसे इशाक जी रहे हैं ।
बेटी ने साथ नही दिया पर वे अपने आप को और अपनी पत्नी को उस उम्र में भी संभाल रहे है जब किसी बुजुर्ग को पूर्णरूपेण सहारे की जरूरत होती है। इशाक जी की बात सुनकर मुझे ग्लानि हो रही थी कि, कैसे होते है वे निष्ठुर संतान जो अपने जन्मदाता को ही घर से निकाल देते है।

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