साकारात्मकता एवं विस्मय का रहस्यात्मक पर्व है, विजयदशमी

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यदि पक्षधरता सही नहीं है, तो सारी शक्तियों के बाद भी पराजय का मुंह देखना पड़ता है, और ना ही उसे इतिहास और वर्तमान का साथ मिलता है।
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कोई भी पौराणिकता अथवा संस्कृति शास्त्र किसी दूसरे की स्त्री के हरण को औचित्यपूर्ण नहीं ठहरा सकता। इसलिये रावण का सीता हरण कार्य औचित्यहीन था, उसे मृत्युदंड देना राम का न्यायपूर्ण कार्य है।
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एक राजा का न्यायकारी होना अति आवश्यक है, यह रावण भी जानता था, अत्याध्ािक ज्ञानी होने के बाद भी असीम शक्तियों ने उसे अहंकारी बना दिया था, इसी कारण उसने लक्ष्मण द्वारा सूपनखा की नाक काटने को अपना अपमान समझ लिया, जबकि सूपनखा का वृृतांत सुनकर उसे सूपनखा को दण्डित करना चाहिये था, क्यो कि सूपनखा ने अपने प्रस्ताव को मनवाने के लिये उदंडता की थी, वह दण्ड की भागी थी।
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राम के सत्य को सरली कृत रूप में लेना उचित नहीं, क्येाकि सत्य केवल एक नहीं होता, यथार्थ भी एक नहीं होता, एक सत्य में कई सत्य छिपे होते हें, यथार्थ में भी कई यथार्थ छिपे होते हैं, इसीलिये सीता और शंबूक के निष्कासन को समझने के लिये एक नई समझ विकसित करने की आवश्यकता है।
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जब कोई भी कथा एक गाथा बनती हे, तो वह एक सूत्रीय नहीं रह जाती, उसकी कई पर्तें होती हैं, उसकी व्याख्या और विवेचना के लिये एक आध्ाार नहीं बनाया जा सकता, विजयदशमी को अनुभूति का एक हिस्सा बनाना चाहिये, अनुभूति में जीवन और उसकी घटनाओं को नवीनता के रूप में देखने की क्षमता होती है।
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विजयदशमी शक्ति का वृहद आयाम है, वह न्याय की पक्षध्ार भी हैं, हम सब इसे राम की जीत के जश्न के रूप में मनाते है। राम की शक्ति निर्बलों को सताने के लिये नहीं थी, उनकी शक्ति असहायों को संबल देती थी, वह न्याय करने में चूक नहीं करते थे, उन्होंने अध्ार्मियों एवं अत्याचारियों एवं अन्यायिओं के विरूद्ध युद्ध किया था,

इसीलिये उन्हें रावण को पराजित करने का अवसर मिला और जीत हांसिल हुई, रावण को हार का मुख देखना पड़ा और मौत को गले लगाना पड़ा उसके सम्पूर्ण वंश का नाश हुआ ऐसा तब हुआ जब उसके पास भी असीम शक्ति थी। लेकिन उसकी पक्षध्ारता सही नहीं थी, इसी लिये रावण को भारी सेना और अत्याध्ािक शक्तियों के बाद भी हार मिली उसका साथ इतिहास और वर्तमान दोनो ही देने के लिये तैयार नहीं होते।

कोई भी शास्त्र किसी दूसरे की स्त्री के हरणको औचित्यपूर्ण नहीं ठहरा सकता

राम और रावण का युद्ध अनेको अनेक लोग रावण द्वारा सीता के हरण को मानते है, सीता के हरण को लेकर इस सत्यता को स्वीकार करना ही पड़ेगा कि कोई भी पौराणिकता अथवा संस्कृति शास्त्र किसी दूसरे की स्त्री के हरणको औचित्यपूर्ण नहीं ठहरा सकता, इसलिये रावण का सीता हरण का कार्य औचित्यहीन था।

उसे मौत देना राम का न्यायपूर्ण कार्य था, वही कुछ लोग रावण द्वारा सीता के हरण का कारण लक्ष्मण द्वारा रावण की बहन सूपनखा के विवाह के प्रस्ताव को ठुकरा देना एवं उसकी नाक-काट कर अपमानित कर भगा देने के प्रतिशोध्ा के रूप में देखते हैं, जिसे एक दम नकार देना भी सही नहीं है, इस दृष्टि भिन्नता को बड़े ही सजगता से समझने की आवश्यकता है, .

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यह सभी मानेगे कि असत्य ही पराजित होता है, यह मान लिया जाये कि रावण ने सीता का हरण अपनी बहन के अपमान के बदले में किया, लेकिन उसके इस कदम को तभी उचित कहा जा सकता था, जब राम अथवा सीता ने सूपनखा का अपमान किया होता, सूपनखा का अपमान तो लक्ष्मण ने तब किया उसे दण्ड दिया, जब उनके इन्कार और शादी शुदा होने की बात सामने रखने के बाद भी सूपनखा नहीं मानी और सीता की हत्या करने के लिये उग्र हो उठी.

ऐसे मे ंवह सजा की पात्र बन गई और उसे लक्ष्मण ने सजा दे दी, यदि रावण न्यायकारी होता तो सूपनखा की दशा एवं उससे वृतांत सुन कर एवं देखकर उत्तेजित नहीं होता, और बदले की भावना को न लाकर सूपनखा को ही दण्डित करता।

शक्तिशाली होने के कारण अहंकारी हो गया था रावण

रावण असीम शक्तियो ंका ध्ाारक था, वह शक्तियां का सदउपयोग करना नहीं जानता था, इसीलिये वह शक्तिशाली होने के कारण अहंकारी हो गया था, और उसने सिर्फ बदले की जिद्द को अपने अन्दर पाल कर सीता का हरण किया और एक बड़े युद्ध को आमंत्रित कर दिया, स्वयं भी मारा गया, अपने वंश का नाश किया और प्रथ्वी को बड़ी संख्या में वीरो से रहित कर दिया, सारे विकास का सत्यानाश कर दिया, असत्य पर सत्य की जीत होती है, यह प्रकृति का नियम है, उस पर मानवों द्वारा निर्मित नियमों का प्रभाव नहीं पड़ता। आखिर रावण मानव ही तो था।

अन्याय के विरूद्ध शक्ति संचयन एवं उसका प्रयोग

अन्याय के विरूद्ध शक्ति संचयन एवं उसका प्रयोग आवश्यक है। राम ने रावण के अन्यायों के विरूद्ध अपनी शक्ति को संचयन कर उसका प्रयोग किया और उसका वध्ा किया, हमे भी राम के भांति दस प्रवृत्तियों वाले सिर ध्ाारण करने वाले उस रावण को जो हमारे अन्दर विराजमान है, उससे लगातार अंातरिक युद्ध करने की जरूरत है, दशहरा शब्द का लोकजगत में यही मूल अवध्ाारणा है.

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दशहरा लोक का पर्व सिर्फ इसलिये बना कि राम ने सारे आकाश के अंध्ाकार को पोछ दिया, रावण पर विजयपाने के लिये राम और शक्ति की देवी दुर्गा एक साथ खड़ी होती हैं, राम से युद्ध के पहले जो पूजा कराई गई वह शक्ति की देवी दुर्गा कीथी, इस पूजा से शाक्त और वैष्णव का संतुलन बना इसीलिये शक्ति के विस्मय के अर्थ आलोक एवं राम के अन्याय प्रतिरोध्ा से विजयदशमी रची गई है।

कोई भी कथा एक गाथा का रूप लेती है तो वह एक सूत्रीय नहीं रह जाती

राम का सर्वोत्तम रूप उस समय सामने आता है, ज बवह संकट के दिनों में आये उनका संकट का समय है, जब उन्होंने अंहकारी रावण की अहममयी व्यवस्थाओं से संघर्ष किया, राम के सत्य को सरली कृत रूप मंे नही लेना चाहिये क्योकि सत्य केवल एक नहीं होता, यथार्थ भी एक नहीं होता, एक सत्य में कई सत्य छिपे होते हैं, यथार्थ में भी कई यथार्थ छिपे होते हैं, इसी लिये शंबूक और सीता के निष्कासन को समझने के लिये एक नई समझ विकसित करने की आवश्यकता है,

घटनाओं को नवीनता के रूप में देखने की क्षमता

जब कोई भी कथा एक गाथा का रूप लेती है तो वह एक सूत्रीय नहीं रह जाती है, उसकी कई पर्ते होती हैं, उसकी व्याख्या और विवेचना के लिये एक आध्ाार नहीं बनाया जा सकता, विजय दशमी को अनुभूति का एक हिस्सा बनाना चाहिये, इसमें शक्ति की विशिष्ट सृजन शीलता है, अनुभूति में जीवन और उसकी घटनाओं को नवीनता के रूप में देखने की क्षमता होती है, इसी कारण सच्ची सृजनात्मकता दास्ता विरोध्ाी और व्यवस्था विरोध्ाी होती है, अक्तोवियो ऐसे महान दार्शनिकने विजयदशमी को शक्ति की सकारात्मकता व विस्मय का रहस्यात्मक पर्व कहा है।

अच्छाई की बुराई पर जीत का पर्व

विजयदशमी की उत्सव ध्ार्मिता का अपना एक साइवर स्पेस होता है, जो समृतियों और सपनों के बीच की दूरी तक फैलाव रखता है, तमाम यथार्थ, तमाम मिथ्य, तमाम इतिहास और तमाम राजनीति में विचरण करने के बाद सभी इसके असीम स्पेस में प्रवेश करते है, तो एक नया संसार सामने आता है, और वह संसार संघर्ष का, अन्याय से प्रतिरोध्ा का, सत्य के आवेग का एवं मुनष्यता का होता है,

साध्ाारण रूप में विजयदशमी अन्याय के विरोध्ा का महापर्व है, भगवान श्रीराम द्वारा रावण पर विजय पाने का पर्व है, इसे अच्छाई की बुराई पर जीत का पर्व भी कहा जाता है, बालक, किशोर और युवक और अंततः एक न्याय प्रिय शासक के रूप मंे प्रेरणादायक है कि उन्हंे मर्यादा पुरूषोत्त्म की संज्ञा दी गई है, भगवान राम के इसी अदभुद जीवन चरित्र को समझने का दिन विजयदशमी ही है।

Hindmorcha Digital Team

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