क्या आप जानते हैं कि रामलीलाओं का मंचन कब शुरू हुआ? आइये आपको बताते हैं देश भर में मंचित होने वाली रामलीलाओं का इतिहास..

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 टांडा अम्बेडकर नगर(एचएम न्यूज)। शहर में चार रामलीलाएं ऐसी हैं जो चार सौ साल से अधिक पुरानी हैं- इनके यहां लीला की शुरुआत श्रीराम के वनगमन से होती है। सबसे पुरानी रामलीला श्रीचित्रकूट रामलीला समिति की है जिसका इस बार 476वां वर्ष है। इसके अतिरिक्त मौनी बाबा की रामलीला, लाट भैरव की रामलीला और अस्सी की रामलीला का इतिहास चार सौ वर्षों से अधिक पुराना है।
रामलीलाएं शुरू कराने के पीछे तुलसी दास का उद्देश्य जनमानस में यह भाव भरना था कि जिस प्रकार राम के युग में रावण का अंत हुआ, उसी प्रकार अत्याचारी मुगल शासन का भी अंत होगा। साहित्यकार डा. जितेंद्रनाथ मिश्र के अनुसार उक्त चार प्रमुख लीलाएं ही अगले तीन सौ वर्षों तक गतिमान रहीं। इसके बाद दूसरे चरण में दारानगर, चेतगंज, जैतपुरा, काशीपुरा, मणिकर्णिका, लक्सा, सोहर कुआं, खोजवां, पांडेपुर क्षेत्र में रामलीलाओं का क्रमिक विकास हुआ।
इन रामलीलाओं को शुरू करने के पीछे ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जनमानस को एकजुट करना था। वहीं ग्रामीण इलाकों में जाल्हूपुर, लोहता, चिरईगांव और कोरौता में रामलीलाएं शुरू की गईं।

21 दिन घर नहीं जाते पंच स्वरूप–

श्रीचित्रकूट रामलीला समिति के पंच स्वरूप पूरी लीला के दौरान अपने घर नहीं जाते। राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और सीता की भूमिका निभाने वाले किशोर लीला स्थल पर ही विश्राम करते हैं। रामलीला का क्रम 21 दिनों तक चलता है। समिति के व्यवस्थापक पं. मुकुंद उपाध्याय के अनुसार इन 21 दिनों में पंचस्वरूपों के लिए विशेष सेवक लगाए जाते हैं।
वे सेवक उनके लिए भोजन पकाने से लेकर उन्हें लीला स्थल तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाते हैं। इस वर्ष पंचस्वरूपों के चयन की प्रक्रिया चल रही है। पंचस्वरूप के लिए करीब 40 किशोरों ने अपना-अपना दावा पेश किया है।

आठ स्थानों पर होती है लीला-

श्रीचित्रकूट रामलीला समिति की रामलीला शहर में आठ स्थानों पर होती है। समिति के मंत्री मोहन कृष्ण अग्रवाल ने बताया कि लीला स्थलों का चयन स्वयं मेधा भगत ने किया था। उस समय काशी में वनक्षेत्र अधिक थे। तुलसी दास जी हनुमान फाटक पर रहते थे, इसलिए उनके घर के आसपास के इलाकों में लीला स्थल बनाए गए।
बड़ा गणेश में अयोध्या, ईश्वरगंगी कुंड में सुरसरि नदी, लोटादास टीला के पास भारद्वाज आश्रम, नई बस्ती में वाल्मीकि आश्रम, धूपचंडी चौराहा चित्रकूट, पिशाचमोचन दंडकारण्य, चौकाघाट मैदान लंका और धूपचंडी मैदान भरत मिलाप स्थल के रूप में चिह्नित है।
वेशभूषा – काशी की रामलीला में लगभग सभी स्थलों के पात्र की वेशभूषा समान होती है। जैसे अयोध्या में राम-लक्ष्मण व सीता ज़री के वस्र व बनारसी साड़ी धारण करते है और वनवास के समय चित्रकूट की लीला में राम-लक्ष्मण पीले रंग की अल्पियाँ धारण करते हैं। ये तुलसी की माला, बाजू-बन्द और केयूर धारण करते हैं।
हनुमान का मुखौटा यहाँ राम के मुकुट के बाद सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। मेघाभगत को अश्वारोही कुमारों ने धनुष-बाण दिया था, अत: यहाँ धुनष-बाण का बहुत महत्व है। धनुष-बाण की झाँकी वाले दिन उसकी आरती उतारी जाती है, और चढ़ावा चढ़ता है। स्वरुप की यहाँ नित्य आरती नहीं होती, राज्याभिषेक व विश्राम के दिन आरती होती है।

काशी में 33 दिन तक चलती है रामलीला-

काशी के नक्खीघाट में रामलीला नौ दिन नहीं बल्कि 33 दिन तक चलती है। वहीं रामनगर की रामलीला नवरात्रि में शुरू होकर शरत पूर्णिमा तक चलती है। तुलसी दास जी काशी के घाट पर रामलीला दोपहर और शाम में करवाते थे। अयोध्या में पहले चैत्र मास की रामनवमी के दौरान भी रामलीलाएं होती थी।
चित्रकूट और अवध की रामलीला- माना जाता है कि गोस्वामी तुलसीदास के शिष्यों ने शुरूआती रामलीला का मंचन (काशी, चित्रकूट और अवध) रामचरित मानस की कहानी और संवादों पर किया। काशी में गंगा और गंगा के घाटों से दूर चित्रकूट मैदान में दुनिया की सबसे पुरानी माने जाने वाली रामलीला का मंचन किया जाता है।
माना जाता है कि ये रामलीला 500 साल पहले शुरू हुई थी। 80 वर्ष से भी बड़ी उम्र में गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी भाषा में रामचरित्रमानस 16 वीं शताब्दी में रामचरित्र मानस लिखी थी।
लखनऊ (अवध) के ऐशबाग की रामलीला- तकरीबन 500 साल का इतिहास समेटे यह रामलीला मुगलकाल में शुरू हुई और नवाबी दौर में खूब फली-फूली। ऐशबाग के बारे में कहा जाता है कि पहली रामलीला खुद गोस्वामी तुलसीदास ने यहां देखी थी।

बनारस (काशी) में रामनगर की रामलीला-

साल 1783 में रामनगर में रामलीला की शुरुआत काशी नरेश उदित नारायण सिंह ने की थी। यहां ना तो बिजली की रोशनी और न ही लाउडस्पीकर, साधारण से मंच और खुले आसमान के नीचे होती है रामलीला।
233 साल पुरानी रामनगर की रामलीला पेट्रोमेक्स और मशाल की रोशनी में अपनी आवाज के दम पर होती है। बीच-बीच में खास घटनाओं के वक़्त आतिशबाजी जरूर देखने को मिलती है। इसके लिए करीब 4 किमी के दायरे में एक दर्जन कच्चे और पक्के मंच बनाए जाते हैं, जिनमें मुख्य रूप से अयोध्या, जनकपुर, चित्रकूट, पंचवटी, लंका और रामबाग को दर्शाया जाता है।

चित्रकूट की रामलीला-

चित्रकूट मैदान में दुनिया की सबसे पुरानी माने जाने वाली रामलीला का मंचन होता है। माना जाता है कि ये रामलीला 475 साल पहले शुरू हुई थी। कहा जाता है चित्रकूट के घाट पर ही गोस्वामी तुलसीदास जी को अपने आराध्य के दर्शन हुए थे। जिसके बाद उन्होंने श्री रामचरित मानस लिखी थी।
उत्तर प्रदेश के गाजीपुर की रामलीला- 5 सौ साल पुरानी रामलीला अब भी हर साल आयोजित की जाती है। इसकी खासियत ये है कि यहां की रामलीला खानाबदोश है। रामलीला मंचन हर दिन अलग जगह पर होता है और राक्षस का वध होने पर वहीं पुतला दहन भी किया जाता है। आप भी देखिए गाजीपुर की ये खानाबदोश रामलीला।

गोरखपुर में रामलीला-

गोरखपुर में रामलीला की शुरुआत अतिप्राचीन है, लेकिन समिति बनाकर इसकी शुरुआत 1858 में हुई। तब गोरखपुर का पूरा परिवेश गांव का था। संस्कृति व संस्कारों के प्रति लोगों का गहरा लगाव था और अन्य जरूरी कार्यो की भांति इस क्षेत्र में भी वे समय देते थे। देखा जाए तो गोरखपुर में रामलीला का लिखित इतिहास 167 वर्ष पुराना है।

कुमायूं की रामलीला-

कुमायूं में पहली रामलीला 1860 में अल्मोड़ा नगर के बद्रेश्वर मन्दिर में हुई। जिसका श्रेय तत्कालीन डिप्टी कलैक्टर स्व. देवीदत्त जोशी को जाता है। बाद में नैनीताल, बागेश्वर व पिथौरागढ़ में क्रमशः 1880, 1890 व 1902 में रामलीला नाटक का मंचन प्रारम्भ हुआ।

होशंगाबाद की रामलीला-

करीब 125 साल पुरानी परम्परा होशंगाबाद के सेठानीघाट में आज भी निभाई जा रही है। धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक त्रिवेणी बन चुकी इस रामलीला की शुरूआत वर्ष 1870 के आस-पास सेठ नन्हेलाल रईस ने की थी। हालांकि वर्ष 1885 से इसका नियमित मंचन शुरू हुआ, जो अब तक जारी है।
सोहागपुर(होशंगाबाद)की रामलीला- सोहागपुर के शोभापुर में रामलीला का इतिहास करीब 150 साल पुराना है। सन 1866 से शुरू हुई रामलीला मंचन की परंपरा को स्थानीय कलाकार अब तक जिंदा रखे हुए हैं। इतने लंबे अंतराल में कभी ऐसा कोई वर्ष नहीं रहा जब गांव में रामलीला का मंचन न किया गया हो। आयोजन से जुड़े चंद्रगोपाल भार्गव ने बताया कि रामलीला की इस वर्ष 150 वीं वर्षगांठ है।
पीलीभीत की रामलीला- मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के मेला का बीसलपुर नगर में 150 वर्ष से भी अधिक पुराना गौरवमयी इतिहास है। दूर दराज से हजारों की संख्या में मेलार्थी लीलाओं का आंनद लेने आते हैं। रामलीला महोत्सव की आधारशिला डेढ़ सौ वर्ष पूर्व रखी गयी थी। मेला मंच पर नहीं होता है, बल्कि रामनगर (वाराणसी) के मेला की तरह बड़े मैदान में होता है।
फतेहगढ़ (फर्रुखाबाद) की रामलीला- 150 साल पुरानी रामलीला को अंग्रेजों का भी सहयोग मिलता रहा है। तब यह परेड ग्राउंड में होती थी। 20 साल पहले सेना की छावनी बन जाने के बाद आयोजन सब्जी मंडी में होने लगा है।
दिल्ली की रामलीला- दिल्ली में रामलीला का इतिहास काफी पुराना है, लेकिन मुगल शासक औरंगजेब ने अपने शासनकाल में रामलीला पर प्रतिबंध लगा दिया था। हालांकि औरंगजेब की मृत्यु के बाद 1719 ई. में दिल्ली की गद्दी पर मुहम्मद शाह रंगीला बैठा। रंगीला के समय पुरानी दिल्ली स्थित सीताराम बाजार में रामलीला का आयोजन होता रहा।
आखिरी मुगल सम्राट बहादुर शाह सफर ने भी रामलीला का मंचन करवाया। लेकिन अंग्रेजी हुकुमत ने रामलीला मैदान में होने वाले इस आयोजन को रुकवा दिया और यहां फौज के ठहरने और घोड़ों का अस्तबल बना दिया। 1911 में पंडित मदन मोहन मालवीय ने फिर से रामलीला की शुरुआत की।
आज चांदनी चौक के गांधी मैदान, सुभाष मैदान और रामलीला मैदान का रामलीला मशहूर है। दिल्ली की सबसे पुराने रामलीला है परेड ग्राउंड की रामलीला। जो 95 साल पुरानी है।

रिपोर्ट : हिन्द मोर्चा डिजिटल टीम

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