“सरकार से असहमति रखने वालों के लिए खतरे की घंटी है UAPA संशोधन बिल”

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( अमित कुमार मंडल)

हाल के कुछ प्रमुख विधेयकों में यूएपीए (अनलॉफुल एक्टिविटी प्रिवेंशन एक्ट) संशोधन विधेयक अत्यंत महत्वपूर्ण था, जिसे संसद से मंजूरी मिली। इसमें कुछ महत्वपूर्ण संशोधन सुझाए गए हैं। विदित हो कि यह कोई नया कानून नहीं है परंतु इस संशोधन द्वारा इसे बहुत कड़ा और कठोर बना दिया गया है।
इसमें सरकार की अधिकृत एजेंसी किसी संगठन को नहीं, बल्कि व्यक्ति विशेष को भी आतंकी घोषित कर सकती है। इसके बाद संबंधित व्यक्ति की ज़िम्मेदारी बनती है कि वह न्याय के मंच पर यह साबित करे कि वह ऐसा नहीं है।

आरोपी ही साबित करेगा अपनी बेगुनाही

अभी तक कोई स्टेट एजेंसी अगर ऐसा आरोप लगाती भी थी, तो वह खुद साबित करती थी कि अमुक व्यक्ति दोषी है लेकिन यहां तो इसके विपरीत जिसके ऊपर आरोप लगा है, उसे ही साबित करना पड़ेगा कि वह गुनहगार नहीं है, जो न्याय के नैसर्गिक सिद्धांतों का एक तरह से खात्मा कर देना है।
इस तरह यह संशोधन लोकतंत्र के नैतिक मूल्यों के खिलाफ है। जब यह संशोधन सदन पटल पर रखा गया, तब इसे रोकने की भरसक संभावना थी। विपक्ष गोलबंद होकर चाहता तो इसे राज्यसभा में रोक सकता था, लगाम लगा सकता था या कम-से-कम सेलेक्ट कमेटी तक ले जा सकता था, जिससे इसमें स्क्रूटनी की जा सके तथा इसे बेहतर बनाया जा सके लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

ऐसे मिली राज्यसभा से मंजूरी

– बड़ी दिलचस्प बात यह है कि राज्यसभा में काँग्रेस द्वारा इस विधेयक की आलोचना करने के बावजूद भी यह विधायक 147 के समर्थन और 42 वोट के विरोध से पास हो गया। इस 42 में सीपीएम, सीपीआई, डीएमके, आरजेडी, एनसीपी और पीडीपी आदि पार्टियां शामिल थीं, जिन्होंने विरोध में वोटिंग तो की परंतु इसके भी कई सदस्य अनुपस्थित रहे और इस प्रकार UAPA को राज्यसभा से भी मंजूरी मिल गई।

पुरानी घटनाओं से सबक नहीं

यह भारत के लिए दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि इस देश में कई ऐसे मामले हैं, जिनमें उग्रवाद एवं अन्य मामलों में कईयों को गिरफ्तार कर उन्हें 23 से 32 वर्षों तक जेल में रखा गया और अंत में यह कहकर छोड़ दिया गया कि वह निर्दोष हैं या उस पर दोष सिद्ध नहीं हो सका।
18 से 20 वर्ष की उम्र में किसी को गिरफ्तार करने के बाद 40 से 45 की उम्र में जब उसकी रिहाई होगी, तब उसकी पूरी ज़िंदगी बर्बाद ही हो गई होगी।
अब तो इस तरह की घटनाएं और भी ज़्यादा होंगी। यह कानून राष्ट्रीय आंतरिक सुरक्षा में कितना कारगर हो पाएगा, यह तो नहीं पता मगर सरकार से असहमति रखने वालों के लिए यह खतरे की घंटी ज़रूर होगी। जिस भी देश में डेमोक्रेसी ढीली हुई है, वहां इस तरह के कानून ज़िम्मेदार रहे हैं।
(लेखक- लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग का छात्र)

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