डा0 श्यामा प्रसाद मुखर्जी धारा 370 के प्रखर विरोधी की मौत कैसे? का सवाल अनुत्तरित

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डा0 श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निर्वाण दिवस पर विशेष

दशकों बीत गये फिर भी रहस्य बरकरार हैं

प्रदीप कुमार पाठक

डा0 श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु प्राकृतिक थी, अथवा राजनीतिक षडयंत्र का परिणाम दशकों बाद आज भी अनुन्तरित है, शायद आगे भी अनुन्तरित ही बनी रहेगी क्योंकि आज तक इसकी कोई छानबीन नहीं की गई, आगे भी कोई छानबीन की आशा की किरण नहीं दिखती तमाम सरकारे आई और चली गई, कई सरकारे तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपना आदर्श मानने वालों के नेतृत्व में बनी लेकिन वह भी मुखर्जी की मृत्यु पर रहस्य के पर्दे को उठाने पर निष्क्रय ही बने रहे, ऐसा नहीं है कि उनकी मृत्यु के रहस्य को सामने लाने के लिये मांग न हुई हो अनेको बार मांगे हुई उनकी बूढ़ी माँ श्रीमती योगमाया ने भी मांग की, वह स्वर्ग भी सिध्ाार गई लेकिन उनकी आवाज भारतीय सरकारों के भीतर नहीं घुस सकी,

सरकारी दस्तावेजों के अनुसार 22-23 जून 1952 की मध्यरात्रि दो बजे डा0 मुखर्जी को दिल को दौरा पड़ा, उन्हें अस्पताल पहुँचाया गया, चिकित्सकों ने उनका उपचार किया लेकिन वह परलोक सिध्ाार गये, लेकिन उनके समर्थकों एवं उनके परिवार ने तत्कालीन सरकार के इस दावे को खारिज करते हुये आरोप लगाया कि उपचार के दौरान डा0 मुखर्जी के अस्पताल में ऐसा इंजैक्शन लगाया गया जो कि उनकी मौत का कारण बन गयाl
मृत्यु के बाद डा0 मुखर्जी के समर्थकों का कहना था कि 22/23 जून की मध्यरात्रि से पहले डा0 मुखर्जी दिन में कई लोगों से मिले थे, तब उन्होंने भारत का संविध्ाान देश के अन्य भागों की भांति जम्मू कश्मीर में भी लागू होना चाहिये. जिसमें अलगाबवाद की कोई गुजांइश न हो का समर्थन कर संविध्ाान निर्माताओं के विपरीति रूख पर एक व्यापक आन्दोलन के संबंध्ा में अपने समर्थकों के सुझाव पर विचार विमर्श किया थाl
उस समय वह तनाव मुक्त थें, वह खुश भी थंे, क्योंकि उन्हें यह विश्वास था कि 23 अथवा 24 जून को नजरबंदी से उन्हें छुटकारा मिल जायेगा ऐसे में सरकारी दाबे पर कि डा0 मुखर्जी की मृत्यु दिल का दौरा पडने पर हुई पर अविश्वास उनके समर्थकों ने किया जांच की मांग उठी पर एक बडे तत्कालीन विपक्षी नेता श्यामाप्रसाद मुखर्जी की मृत्यु हिरासत में हुई बाबजूद इसके छानबीन की वह साध्ाारण प्रक्रिया जो हिरासत में रहतें हुये एक कैदी की मृत्यु पर अपनाई जाती है, नहीं अपनाई गई, जो आज तक एक बड़ा रहस्य बना हुआ हैंl
भारत के संविध्ाान के निर्माण काल में तत्कालीन राज्य के सत्ताध्ाारियों की उस मंशा को तत्कालीन विपक्ष ने भांप लिया था, जिसमें भारतीय संविध्ाान में अन्य भागों की भांति जम्मू-कश्मीर को शामिल नहीं किया जा रहा था, जम्मू-कश्मीर को एक अलग शक्ति प्रदान की जा रही थी, जिसमें अलगावबाद की स्पष्ट झलक दिख रही थी, ऐसा भांपकर राज्य में पंडित प्रेमनाथ डोगरा के नेतृत्व में प्रजा परिषद ने संघर्ष शुरू कर दियाl
उन्होंने तमाम तत्कालीन राष्ट्रीय नेताओं से संपर्क किया डा0 श्यामाप्रसाद मुखर्जी से भी संपर्क साध्ाा गया, मुखर्जी ने इस विषय पर गंभीरता से विचार किया और वह इस मांग के समर्थन में सबसे आगे आकर खड़े हो गयेl
डा0 मुखर्जी किसी भी समस्या को सुलझाने के लिये बातचीत पर अध्ािक विश्वास रखतें थें, यही कारण था कि उनके कहने पर जम्मू में आयोजित होने वाली एक बड़ी रैली को उस समय स्थगति कर दिया गया, डा0 मुखर्जी जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन प्रध्ाानमंत्री शेख मो0 अब्दुल्ला से मिलने श्रीनगर चले गये, दोनों नेताओं की बात हुई, लेकिन वह क्या हुई?
आज तक उसका कोई प्रमाण नहीं मिला श्रीनगर से वापिस आकर जम्मू की रैली में डा0 मुखर्जी ने जो घोंषणा की वायदा किया कि वे विध्ाान दिलायेंगे या प्राण त्याग देगें उनके यह वयान उस समय यह साबित कर रहें थें कि शेख अब्दुल्ला से उनकी बातचीत का सकारात्मक परिणाम नहीं आया, फिर भी अपनी मांग और बात पर अटल थेl
जम्मू-कश्मीर राज्य के लिये अलग संविध्ाान के गठन के विरूद्व नवबंर 1952 में प्रजापरिषद ने सत्याग्रह आंदोलन शुरू कर दिया तो तत्कालीन सरकार ने दमन चक्र शुरू कर दिया, सत्याग्रहहियों के अतिरिक्त बड़ी संख्या में सत्याग्रहियों के समर्थकों को दूर-दराज सर्द क्षेत्रों में बंदी बनाकर भेज दिया गयाl
राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लहराने वाले 16 लोगों को गोंलियों से भून दिया गया, तब अनेकों महिलाओं ने एक टीम बनाकर दिल्ली में डा0 मुखर्जी से संपर्क साध्ाा, हालातों को भांपकर मुखर्जी ने परिस्थितियों का जायजा लेने के लिये जम्मू-कश्मीर राज्य मे जाने का निर्णय लिया वह मई 1953 के दूसरे सप्ताह में चल पड़ें रास्तें मंे कई रैलियों को उन्होंने संबोध्ाित किया लाखों लोगों ने उनका स्वागत किया अंत तक उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जायेगा यह बात होती रही लेकिन 12 मई को श्यामाप्रसाद मुखर्जी को उस समय गिरफ्तार कर लिया गयाl
जब उनकी गाड़ी रावी नदी के पुल से गुजर रही थी, उनके साथ जा रहंे तत्कालीन जनसंघ के प्रध्ाान गुरूदत्त और सचिव टेकचंद को भी हिरासत में ले लिया गया और तीनों को श्रीनगर ले जाकर निशातबाग के दो कमरों में एक कैदी के रूप में रखा गयाl
साक्षौ के आध्ाार पर वह कमरे बाग की देख-रेख करने वाले मालियों के लिये थे, कई वर्षो तक इनका अस्तित्व बना रहा, कश्मीर आने वाले देश एवं विदेशों के पर्यटक जब बडी संख्या में वहां पहुँचने लगे, तब हट्स के स्थान पर पानी की आपूर्ति से संबंध्ाित बाटर टैंक वहाँ बना दिया गया, तत्कालीन सरकार ने यह झँूठ भी बोला कि डा0 मुखर्जी को निशात बाग के साथ एक बंगले में नजरबंद कर रखा गया हैं, जबकि वहां कोई बंगला कभी था ही नहींl
डा0 मुखर्जी की उक्त नजरबंदी को लेकर एक भूचाल सा आ गया था, देश में जगह-जगह इसका विरोध्ा शुरू हो गया था, उसी समय डा0 मुखर्जी के वकील वैरिस्टर यू0 एम0 द्विवेदी ने राज्य के उच्च न्यायालय मे नजरबंदी का विरोध्ा करते हुये एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की थीl
जिस पर न्यायालय ने वहस सुनकर आदेश को एक सप्ताह के लिये सुरक्षित रख लिया था, उस समय एक आम ध्ाारणा बन गई थी कि 23 से 24 जून तक निर्णय सामने आ जायेगा और डा0 मुखर्जी की नजरबंदी समाप्त हो जायेगी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका 23/24 जून की अधर््ारात्रि को डा0 मुखर्जी की मृत्यु हो गई, जो आज भी रहस्य के घेरे में फंसी हुई हैंl
डा0 मुखर्जी की रहस्मयी मृत्यु की गुत्थी को सुलझाने का प्रयास नहीं किया गया यह एक अलग बात हैं, लेकिन उनके बलिदान को भुलाने का कभी प्रयास नहीं किया जाना चाहिये, उनका बलिदान कश्मीर में अलगाववाद की दीवारों को तोड़ने में भले सफल नहीं हुआ, लेकिन उनके कारण ही कश्मीर में परमिट सिस्टम का अंत हुआl
उच्चतम न्यायालय चुनाव आयोग एवं महालेखाकार के कार्य में विस्तार हुआ, सबसे बड़ी बात यह है कि आज जो कश्मीर के हालात हैं, उस पर टिप्पड़ी करते समय देश का प्रत्येक नागरिक यह कहने से चूक नहीं करता कि उस समय डा0 मुखर्जी के विचारों को तत्कालीन संविध्ाान निर्माताओं एवं तत्कालीन सरकार ने गंभीरता से लिया होता और कश्मीर के लिये संविध्ाान में एक अलग स्थान का प्रावध्ाान न किया होता, तो आज कश्मीर के यह हालात नहीं होते और कश्मीर एक मजबूरी बनकर न रह गया होताl

लेखक हिन्दमोर्चा के प्रधान संपादक हैं।

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