योग, मनुष्य ऊर्जा का अक्षय स्रोत

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-अभिषेक पाण्डेय

योग का शाब्दिक अर्थ होता है जोड़ना, जोड़ का (+) चिन्ह है, जो धनात्मकता का सूचक है, इसका अंग्रेजी शब्द positive है अर्थात सकारात्मक है। इसलिए सरल शब्दों में कहा जाए तो ’’सकारात्मक पदार्थों, व्यवहारों, विचारों, व्यक्तियों, समुदायों व देशों का संग्रहण अथवा एकत्रीकरण योग कहलाता है।’’
एक कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी योग के इस अर्थ से भलीभांति परिचित है और वह यह भी जानता है कि नकारात्मक पदार्थों का संग्रहण नहीं किया जा सकता। यदि उनका संग्रह किया तो वह विनाश का कारण ही बनेगा।
क्योंकि ऋणात्मक (-) चिन्ह का शिखर शून्य (0) है, और इसे यदि लगातार जारी रखा जाए तो शून्य से चलकर ऋणात्मक अनन्त (0, -1, -2, -3………) ही होगा, अर्थात यह कार्य अधोपतन से शुरु होकर अधोगति तक अनवरत तब तक चलता रहेगा, जब तक उसके अस्तित्व का सर्वथा विनाश नहीं हो जाता।
यही कारण है कि सकारात्मक चिन्तन और दृष्टिकोण को हर सफलता की गारंटी माना जाने लगा है। मनुष्य के चिन्तन और व्यवहार में कैसे अधिक से अधिक सकारात्मक विचारों का समावेश हो इसके लिए बड़े-बड़े शोध हो रहे हैं। प्रबंधन विषय के छात्रों के लिए यह बड़े अध्य्यन का क्षेत्र बन गया है।
सकारात्मक विचारों के बिना हमारे जीवन से सकारात्मक चिन्तन और व्यवहार परिलक्षित नहीं हो सकते और यदि ऐसे विचारों का संग्रहण कर भी लिया जाए तो उनको चिन्तन और व्यवहार में उतारना सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। इसमें हमारी दैनिक आदतें ही सबसे बड़ा रोढ़ा उत्पन्न करती हैं और हम उनके समक्ष असहाय हो जाते हैं। आदतों के वशीभूत होकर मनुष्य निरन्तर अधःपतन के मार्ग पर बढ़ता जाता है और अन्त में अधोगति को प्राप्त होता है।
आदतों को कैसे जीता जाए? आदतों का सीधा सम्बन्ध हमारे शरीर से, अर्थात मन-वाणी, आचार-विचार व आहार-बिहार से है। जिनपर नियंत्रण के बिना आदतों पर विजय पाना संभव नहीं है। इसका मार्ग हमें नियमित योगाभ्यास से मिलता है।
नियमित योगाभ्यास सकारात्मक विचारों की पुनरावृत्ति करवाता है और उनको हमारे मस्तिष्क में उनको पुष्ठ करता है और साथ ही उस विचार पर आगे बढ़ने का मार्ग भी सुझाता है, जो हमें सकारात्मक चिन्तन और व्यवहार की ओर ले जाते हैं। यह कैसे संभव है? इस प्रश्न का उत्तर भी योगाभ्यास है।
जब हम नियमित योगाभ्यास करते हैं तो देखते है कि शनैः शनैः हमारी बुरी आदतें और नकारात्मक विचार हमसे दूर होते जा रहे हैं और ऐसा करने को मन भी नहीं करता। कुछ समय के उपरान्त सकारात्मक चिन्तन हमारे रोम-रोम में प्रवाहित होने लगता है, जो धीरे-धीरे हमारे व्यवहार में शामिल होने लगता है। जिसका परिणाम यह होता है कि हम सफलता की नए-नए कीर्तिमान स्थापित करते चले जाते हैं। जहां से हमको गिराने वाला कोई नहीं होता है।
नियमित योगाभ्यास से ऐसा कैसे संभव होता है? यह सवाल हमारे मस्तिष्क में उठना स्वाभाविक ही है और यह जानना भी चाहिए। हम सभी जानते हैं मनुष्य शरीर आदतों का गुलाम होता है। हम दैनन्दिन जीवन में जो कुछ भी करते हैं, हमारा शरीर धीरे-धीरे उसकी आदत डालने लगता है। जैसे- देर रात सोना और सुबह देर से जागना, ऐसा बचपन से नहीं करते थे लेकिन टेलीवीजन देखने व अन्य कार्यालयी कार्यों को पूरा करने या फिर परीक्षा के दवाब में देर रात तक पढ़ने की बजह से करना पड़ता है।
लगातार कुछ दिनों तक ऐसा करते रहने से हम देखते हैं, ’’रात को जल्दी नींद ही नहीं आती और सुबह जल्दी उठा नहीं जाता।’’ धीरे-धीरे यही आदत में तब्दील होने लगता है। फिर यदि सुबह के समय हमको कोई जगाने का प्रयास भी करता है तो उसपर झोंझल आती है और हमसे उठा नहीं जाता।
इस एक गलत आदत की बजह से कुछ समय के बाद तमाम तकलीफें उठानी पड़ती हैं, हम समय से कार्यालय नहीं पहुंचते हैं और उच्चाधिकारी की डांट सुननी पड़ती है, डांट की बजह से मन छुब्ध होता है, जिससे मानसिक तनाव उत्पन्न होता है और किसी काम को करने में मन नहीं लगता। यहींे से नकारात्मक विचार उत्पन्न होने लगते हैं।
नकारात्मक विचारों के प्रभाव हमारे कार्य पर पड़ता है और किसी भी कार्य में हमको सफलता नहीं मिलती। मानसिक तनाव, नकारात्मक विचारों और असफलता से घिरा मनुष्य धीरे-धीरे रोग ग्रस्त होने लगता है, उसके शरीर को तमाम व्याधियां घेर लेती हैं और यहीं से मनुष्य का अधःपतन प्रारम्भ हो जाता है।
इसके विपरीत योगाभ्यास करने वाला व्यक्ति ऊर्जावान, सकारात्मक विचारों से युक्त व निरोगी रहता है। योगाभ्यासी व्यक्ति किसी कारणवश यदि रात को विलम्ब से सोया भी है तो भी वह सुबह जल्दी उठने का प्रयास करता है और शरीर के लिए आवश्यक ऊर्जा का संचय योगाभ्यास के माध्यम से करता है और तरोताजा होकर दिनभर सकारात्मक विचारों के साथ सभी कार्यों को अंजाम देता है। जिससे उसकी सफलता में कोई संदेह नहीं रह जाता। ऐसा व्यक्ति सफल से सफलतम की ओर बढ़ता जाता है, जिससे वह देश व समाज के लिए एक उदाहरण बन जाता है।
यहां हमने सिर्फ दिनचर्या से होने वाले प्रभाव और कुप्रभाव की चर्चा की है। ऐसा सिर्फ जीवन के एक क्षेत्र में ही नहीं बल्कि इसका व्यापक प्रभाव हमारे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर पड़ता है। प्रत्येक छोटी-बड़ी, अच्छी-बुरी आदत ही हमें उत्थान और गर्त में ले जाती है। जिसको हम योगाभ्यास के माध्यम से सही समझ सकते हैं। ’’बुराई छोड़ने से नहीं जाती बल्कि उसके स्थान पर हम अच्छे कार्यों को अंजाम देने लगें तो धीरे-धीरे वह हमें स्वतः छोड़कर चली जाती है।’’ यह कार्य योगाभ्यास से बहुत शीघ्र होता है।
योगाभ्यास से शरीर-मन-वाणी तीनों में पवित्रता आती है। हमारा मन सही व गलत का सटीक निर्णय कर पाता है और क्या त्याज्य और क्या अत्याज्य है यह कार्य शरीर स्वयं करने लगता है और फिर मन में वैसे ही विचार आने लगते हैं।
किसी भी प्रकार का नशा, व्यसन हमारे शरीर व स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, यह तो हम सभी जानते हैं लेकिन आदत में आ जाने के कारण उसे चाहकर भी छोड़ नहीं पाते। लेकिन योगाभ्यास एक ऐसी औषधि है जो ऐसा करने से हमें रोक देती है। जब आप नियमित योगाभ्यास करते हैं, तो कुछ समय बाद आप स्वयं देखेगें, ’’नशा करने की इच्छा ही नहीं होगी।’’
यदि आप फिर भी ऐसा करते हैं तो आपका शरीर स्वयं उसकी नकारात्मक प्रतिक्रिया देगा। योगाभ्यास स्वयं हमारे आहार-बिहार को नियंत्रित करने लगता है और स्वस्थ शरीर के लिए कब, क्या और कितना आवश्यक है, उसका मानक तय कर देता है।
एक कहावत हैं, ’’एक म्यान में दो तलवारे नहीं रह सकतीं, इसी प्रकार हमारे मन में सकारात्मक और नकारात्मक विचार एक साथ नहीं रह सकते।’’ सकारात्मक विचारों का प्रवाह जब हमारे मन में होता है तो नकारात्मक विचार स्वयं छोड़कर जानंे लगते हैं, दूसरे शब्दों में कहें तो सकारात्मक विचारों का प्रवाह, नकारात्मक विचारों को delete कर देता है।
जिससे मन के अन्दर सकारात्मक विचारों का संग्रह होने लगता है, जो हमें व्यक्तिगत व समाज जीवन में उत्थान, प्रगति के मार्ग अग्रसर करते हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं, ’’जिस प्रकार सूर्य समस्त ब्रह्माण्ड के लिए अक्षय ऊर्जा का स्रोत है उसी प्रकार योग भी मनुष्य की सकारात्मक ऊर्जा का अक्षय स्रोत है।’’
बहुत से लोग योग को वैराग्य से जोड़कर देखते हैं लेकिन यहां वैराग्य का अभिप्राय घर, परिवार, देश और समाज से नहीं अपितु ऐसे विचारो, व्यवहारों व आदतों से है, जिनका हमारे दैनन्दिन जीवन पर कुप्रभाव होता है।

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