भारतीय संस्कृति के हीरो संत कबीर, आज भी दहकते अंगारे हैं

0
53

*प्रदीप कुमार पाठक*

  • कबीर ने उस परमतत्व की अभिव्यक्ति, जो पहले संस्कृति, पालि, अरबी आदि गूढ़भाषाओं की सीमा में आबद्ध थी, उसे निकाल कर जनभाषा में की, कबीर ने कर्मकाण्ड पर तीखा प्रहार किया है, मुल्ला-मौलवी और पंडितों को फटकार लगाई हैं, भगवान की प्राप्ति अंतरानुभूति से बताई हैं, वे दहकते अंगारे थे, आज भी वे दहकते अंगारे हैं,

ज्ञान मार्ग के साधक, समत्व-सिद्धांत के प्रतिनिधि महाकवि एवं संत कबीर, मध्यकाल जो कबीर की चेतना का प्राकट्काल है के लिये वे दहकते अंगारें थें, तो आज भी वह दहकतें अंगारे हैं, कबीर के प्राकट्काल में समाज धार्मिक पाखंड, जाति पात, छुआछूत, अंधश्रद्धा के जाल में फँसा हुआ था, मौलवी-मुल्ला-पंडित-पुरोहितों का ढ़ोंग और सांप्रदायिक उन्माद चरम पर था, उस समय तमाम विरोध के रहते कबीर ने अपने विचारों को जनता के बीच जनता की ही भाषा में रखा उनकी वाणियाँ लोकप्रिय हुई वह आज भी लोकप्रिय हैं,
संत एवं कवि कबीर की कविताओं एवं उपदेशों का महत्व मध्यकाल में भी था, आज भी हैं क्योंकि आज भी हम उस काल में जी रहें हैं, जहां जातिवाद की कुत्सित राजनीति, धार्मिक पाखंण्ड का बोलबाला हैं, सांप्रादायिकता की आग में जनमानस झुलस रहा हैं.
आतंकवाद का नग्नताण्डव, तंत्र मंत्र के मिथ्या भ्रमजाल में सारा समाज फंसा हुआ हैं, इसी बीच समाज के अंदर से जब कबीर की वाणियां सुनने को मिलती हैं, तो यह अहसास होता है कि आज भी लोग कबीर की वाणियों से प्रेरित हैं, वह आडम्बरों को छोड़कर एक सच्चे मार्ग पर चलना चाहतें हैं, ऐसा प्रतीत होता हैं कि कबीर हमारे लोकजीवन के इर्दगिर्द ही घूम रहें हैं.
महाकवि एवं संत कबीर दास के जन्म का वृतांत माता सीता के भांति आज भी रहस्यमय बना हुआ है कई आधारों पर उनका प्राकट्काल 1455 एवं मृत्यु विक्रम संवत 1575 मानी जाती हैं, कबीर का लालन पालन एक जुलाह परिवार में हुआ, कबीर ने सभी धर्मों एवं समाज को ठीक उसी प्रकार से धुना जिस प्रकार से एक जुलाह रूई को धुनकर एकतार करता है।
कबीर ने अपनी पहली शिक्षा सुरत से मरो तुम स्मरण से भरो परमात्मा के दी हैं, उनका मनना था कि जैसे-जैसे परमात्मा के स्मरण से भरना होगा वैसे-वैसे परमात्मा की याद सघन होगी तभी अंहकार का भाव कम हो जायेगा , परमात्मा और अंहकार एक म्यान में दो तलवारे है जो एक साथ नही चल सकती, उन्होने कहा है कि
सुरति करो मेरे सांइयां , हम है भवजल मांहि ।
आपे ही बहि जायेगे , जेनहि पकरो बांहि।।
कबीर ने अपनी बीजक वाणी मे हिन्दू – मुस्लिम के साथ-साथ ब्रहाण्ड के सभी लोगो को एक ही धर्ती पर पे्रम पूर्वक मानव के रूप में जीने की सलाह दी है, वे कहते है “वो ही मोहम्मद , वो ही महादेव , ब्रह्मा आदम कहिये, को हिन्दू को तुरूक कहाए, एक जिम पर रहिये” कबीर ने काजी-मुल्ला और पंडितो को फटकार लगाते हुये स्पष्ट शब्दो में कहा “कि काजी तुम कौन कितेब बखानी, झंखत बकत रहहु निशि बासर, मति एकऊनही जानी। दिल में खोजी खोजा दे। बिहिस्त कहां से आया?”
कबीर ने बेवाक होकर साफ सुथरे निश्छल मन से समाज को स्वर्ग-नर्क के भ्रम से बाहर निकालने का प्रयास किया, वही कबीर ने घट-घट वासी चेतन्य तत्व को राम के रूप में स्वीकार किया है.
उन्होने राम को जीवन आश्रय माना है इसलिये कबीर के बीजक में चेतन राम की एक सौ सत्तर बार अभिव्यंजना हुई हैं, कबीर आज भी दहकतें अंगारे है, कानन कुसुम भी है कबीर जिनकी भीनी-भीनी गंध और सुवास नैसर्गिग रूप से मानवीय अरण्य को सुवासित कर रही है, कबीर भारतीय मनीषा के भूगर्भ के फौलाद है, जिसके चोट से ढोग-पाखण्ड और धर्मादंता चूर-चूर हो जाती है, इसलिये उन्हे भारतीय संस्कृति का हीरो भी माना जा सकता है.
कबीर की जनभाषा द्वारा अभिव्यक्ति की उच्च और व्यापक शैली संस्कृति और अरबी क्या संसार की किसी अन्य भाषा में नही पाई जाती , उन्होनें अपने भाव और विचारो को जन के समक्ष उन्ही की भाषा में प्रस्तुत किया है, कबीर जो परमात्मा का उपदेश देते थे वह तर्क वितर्क पूजा पाठ से नही अपितु अंतरानुभूति से प्राप्त होता है.
इस प्रकार वे देश समाज, धर्म की जीवन पर्यन्त सेवा करते रहे और उसे उच्चादर्श से विभूषित करते रहे, सबसे बडी बात तो यह है कि संत कबीर ने उस परमतत्व की अभिव्यक्ति जो पहले संस्कृति पालि, अरबी आदि गूढ़भाषाओ की सीमा मंे आबद्ध थी, उसे निकालकर जनभाषा में की, कबीर के सामने अन्य कोई महापुरूष शायद नही होगा जिसने जनता के हृद्यभाव को जानने का प्रयास कबीर के भांति किया हो, कबीर उस प्रकाश स्तंभ के समान है, जो युग-युग तक विश्व मानव समाज को आलोकित करता रहेगा.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.