निरहुआः भोजपुरी के रंगीन ड्रामे से सियासी अखाड़े तक

0
162
Report : Gyan Prakash Singh

भोजपुरी फिल्मों के जुबली स्टार कहे जाने वाले दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ ने स्टारडम हासिल करने के बाद साल 2013 की तपती जून में जिस पहले राजनीतिक कार्यक्रम में शिरकत की थी वो समाजवादी पार्टी ने आयोजित किया था.
मंच पर केंद्र में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव विराजमान थे और दाहिनी तरफ सबसे किनारे की कुर्सी पर निरहुआ को जगह दी गयी थी.

तब खुद उन्हें सपने में भी ख्याल नहीं आया होगा कि छह साल बाद वे उसी लोकसभा सीट के लिए खम ठोंकेंगे जिस पर खुद मुलायम ही विराजमान हैं. संयोग का डबल डोज ये कि इस मैदान-ए-जंग में उन्हें उस अखिलेश यादव से पंजा लड़ाना है जिनके कर कमलों से कुछ ही बरस पहले उन्होंने यश-भारती सम्मान ग्रहण किया था.

बमुश्किल हफ्ता भर पहले 27 मार्च को उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ली. दो अप्रैल को सरकार ने उन्हें वाई-श्रेणी की सुरक्षा देने का ऐलान किया और 3 अप्रैल को पार्टी ने उन्हें समाजवादी किला कहे जाने वाले आजमगढ़ लोकसभा सीट से उम्मीदवार घोषित कर दिया. उसी दिन उन्होंने साफ किया कि अखिलेश यादव भाई जैसे हैं लेकिन सिर्फ यादव होने के चलते उन्हें समर्थन देना मेरी फितरत नहीं. और ये भी कि वे अखिलेश भक्त नहीं देश भक्त हैं.

पश्चिम बंगाल के चैबीस परगना और कोलकाता से होकर गाजीपुर के एक ठेठ गाँव में वापसी और फिर मायानगरी मुम्बई से होते हुए दुनिया के ढेरों मुल्कों में स्टेज शो के बाद अब राजनीति?

उनकी जिन्दगी में ऐसे नाटकीय बदलाव अक्सर आते रहे हैं.

आप उनसे उनका जन्मदिन पूछें तो वे अपने दो जन्मदिन बताते हैं- पहला 1981 का – जो दिनेश लाल यादव पुत्र कुमार यादव का जन्मदिन है और दूसरा 22 मार्च 2003 का जब उनके एक लोकप्रिय अल्बम निरहुआ सटल रहे ने कामयाबी के ऐसे झंडे गाडे कि निरहुआ उनका दूसरा और कहीं ज्यादा लोकप्रिय नाम हो गया.

मूलतः उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले की जखनिया तहसील के टडवां गाँव के बाशिंदे दिनेश लाल का बचपन कोलकाता में बीता जहाँ उनके पिता कुमार यादव नौकरी करते थे.

बड़े भाई विजयलाल यादव और चचेरे भाई प्यारेलाल यादव बिरहा गायकी के बड़े नाम हुआ करते थे लिहाजा घर में गायकी को लेकर अच्छा माहौल था. प्यारेलाल की सिफारिश से उन्हें काम मिलना शुरू हुआ. कभी ढोलक तो कभी हारमोनियम बजाने और कभी-कभी कोरस में गाने का भी.

2002 में चंदा कैसेट कंपनी ने उनका एक अल्बम रंगीली होली आ गयी निकाला ,जो खूब बिका. इस सफलता के बाद मशहूर टी सिरीज से 2003 में उनका अल्बम निरहुआ सटल रहे आया जिसने बिक्री के सारे रिकार्ड तोड़ डाले.

दुलहिन रहे बीमार, निरहुआ सटल रहे… जैसी लाइनों वाला ये गाना दरअसल युवा पीढ़ी पर कटाक्ष करता था जो माँ-बाप की बजाय बीवी पर ज्यादा ध्यान देते थे. मगर उनकी अलग-अनोखी आवाज और जबरदस्त संगीत ने इसे चैराहे-चैराहे तक लोकप्रिय कर दिया और उस साल शादियों में बैंड वालों ने भी इसकी धुन बजाना शुरू कर दिया.

2005 में फैजाबाद के रहने वाले निर्माता संजय श्रीवास्तव ने हमका ऐसा वैसा ना समझा फिल्म के लिए साइन किया हालांकि उसी बीच निर्माता सुधाकर पाण्डेय ने उन्हें अपनी फिल्म चलत मुसाफिर मोह लियो रे में मौका दिया.

यह फिल्म हिट साबित हुई और इसके बाद हो गइल बा प्यार ओढनिया वाली से ने बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड कमाई की. उनकी फिल्म निरहुआ रिक्शावाला पहली भोजपुरी फिल्म थी जो ओवरसीज यानी ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, ऑकलैंड और फिजी में भी रिलीज हुई.

यह फिल्म गोल्डन जुबली साबित हुई और वे भोजपुरी फिल्मों के सुपर स्टार बन गए. कुछ अरसे पहले एक लम्बी गुफ्तुगू में उन्होंने माना था कि किस्मत उन पर खासी मेहरबान रही है और ष्मुझे ऐसी-ऐसी चीजें मिलीं जो मैं कभी सोच भी नहीं सकता था.

वर्ष 2000 में जब उन्होंने गायकी शुरू की तो सपने में भी नहीं सोचा था कि केवल 7 साल के भीतर ऐसा भी आएगा जब वे ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, फिजी और ऑकलैंड में 20 हजार की भीड़ के बीच स्टेज शो करेंगे जहाँ विदेशी लड़कियां उनके प्रोग्राम की टिकट अपनी बाँहों पर स्टाम्प की तरह चिपका कर चीखेंगी.

वे भोजपुरी ही नहीं हिंदी फिल्मों के इतिहास में भी पहले ऐसे नायक हैं जिनके नाम से आधे दर्जन ज्यादा फिल्में बनीं और चलीं मसलन- निरहुआ रिक्शावाला, निरहुआ चलल ससुराल, निरहुआ नंबर वन, निरहुआ के प्रेम रोग भईल, निरहुआ मेल आदि.

फिल्में दरअसल उनकी जिन्दगी में बचपन में ही पैठ गयीं थीं. बकौल निरहुआ 24 परगना के बेलघरिया इलाके में जहाँ हम लोग रहते थे वहां से 3 किलोमीटर दूर वीडियो पर फिल्में दिखाई जाती थीं. मैं रात को अपने बिस्तर पर दो तकिये सजाकर उस पर चादर डाल कर फिल्में देखने निकल जाता था और भोर में 5 बजे आकर वापस बिस्तर पर सो जाता था.

शायद इसी फिल्मबाजी ने वे उनमें फिल्मों की गहरी समझ पैदा की है. अपने प्रोजेक्ट्स डिजाइन करते समय बाजार और मांग का खासा ध्यान रखते हैं. चाहे वो स्टंट्स का मामला हो या किसिंग सीन का- भोजपुरी फिल्मों में वे अग्रणी प्रयोगकर्ता साबित हुए हैं. फिल्म श्नरसंहारश् के लिए उन्होंने अपना सर मुंडा लिया क्योंकि फिल्म के नायक के पूरे परिवार की हत्या कर दी जाती है. वे चाहते थे कि वे खुद उस पीड़ित की तरह दिखें.

अन्य भोजपुरी कलाकारों से अलग अपनी मेहनत और समयबद्धता के चलते वे दक्षिण भारतीय निर्माताओं में भी लोकप्रिय हैं. 2007 में जी सुब्बाराव ने उन्हें श्कईसे कहीं तोहरा से प्यार हो गईलश् में लिया था और उनकी इतनी तारीफ हुई कि बाद में बीओ सुब्बारेड्डी ने खिलाड़ी नंबर-1, और मशहूर निर्माता डी रामानायडू ने शिव और दी टाइगर में उन्हें बतौर हीरो साइन किया.

नया करते रहने के शौकीन

हालांकि उनका नाम अपनी को स्टार पाखी हेगड़े के साथ खूब जुड़ा पर कम ही लोगों को पता है कि वे दो बेटों आदित्य और अमित के पिता हैं. उनकी पत्नी मंशा लाइमलाइट से दूर रहना पसंद करती हैं.

परिवार के लिए बेहद समर्पित निरहुआ ने अपनी कामयाबी के बाद छोटे भाई प्रवेशलाल यादव को इंडस्ट्री में जमाने के लिए कई फिल्में बनाईं जिसमें वे खुद भी थे. उन्हें सबसे पहले काम दिलाने वाले चचेरे भाई प्यारेलाल यादव कवि जी अब निरहुआ इन्टरटेनमेंट की फिल्मों के लिए गाने भी लिखते हैं.

ओशो और स्वेट मार्डन को पढ़ने के शौकीन निरहुआ क्रिकेट खेलने के लिए कहीं भी जगह तलाश सकते हैं. 2010 में उन्होंने टी-10 गली क्रिकेट प्रतियोगिता का आयोजन भी किया था जिसमें पूर्वांचल की 16 टीमों ने शिरकत की थी.

2012 में अचानक वे मशहूर टीवी शो श्बिग बॉस के छठे सीजन में नजर आये हालांकि वहां उनका प्रवास हफ्ते भर ही रहा. पचास से ज्यादा फिल्में कर चुके और फिलहाल 6 फिल्मों में काम कर रहे निरहुआ को नयी-नयी जमीनें तोड़ने में बहुत मजा आता है.

जब मैंने इसकी वजह पूछी तो उनका जवाब बड़े ही दार्शनिक अंदाज से भरा हुआ था. देखिये हमारे भोजपुरी में एक कहावत है- जो फरा सो झरा, जो बरा सो बुताना. हर चीज का एक समय है. आज है कल नहीं रहेगा. क्या हर्ज है अगर आज हम दूसरे कामों में भी हाथ आजमा लें? शायद इसीलिए आज वे फिर एक नए मैदान में दिख रहे हैं.

रपटीली है राजनीति की डगर

मगर राजनीति की डगर उतनी आसान भी नहीं. मुस्लिम, यादव और दलित वोटों की प्रधानता वाली आजमगढ़ सीट पर उन्हें उतार कर बीजेपी ने अखिलेश को घेरने की कोशिश की है. पिछली बार बीजेपी के प्रत्याशी रहे रमाकांत यादव ने सपा सुप्रीमो को कड़ी टक्कर दी थी. पूरा कुनबा उतारने के बावजूद मुलायम कुल 63,204 वोटों से ही जीत पाए थे.

तब उन्होंने मैनपुरी सीट छोड़कर आजमगढ़ सीट अपने पास रखी थी. पांच साल के भीतर सब कुछ बदल गया है. पार्टी और आजमगढ़ की विरासत पर अब उनके बेटे अखिलेश यादव का दावा है. और मुलायम को दुबारा मैनपुरी भेज दिया गया है. मुलायम के लिए हर मोर्चा सँभालते आये शिवपाल अब बहुत दूर हो गए हैं.

रमाकांत के लिए ये स्थितियां माकूल हो सकती थीं मगर बीते कुछ अरसे में वायरल हुए उनके अनेक भाषणों ने पार्टी और वोटरों के एक तबके के मन में उनके प्रति गहरी नाराजगी पैदा कर दी है. शायद टिकट न मिलने का कारण भी यही था. मैदान में उनकी जगह अब निरहुआ हैं.

ज्यादातर लोग मानते हैं कि उनके लिए यह बहुत मुश्किल जंग होगी. वरिष्ठ स्थानीय पत्रकार संदीप अस्थाना कहते हैं- आजमगढ़ समाजवादियों की सबसे सुरक्षित सीट रही है. इसने हमेशा सत्ता विरोधी रुख दिखाया है. लोग-बाग अखिलेश और निरहुआ के राजनीतिक कद का भी आकलन करेंगे ही.

यह वायरल संयोग है कि एक वक्त भोजपुरी सिल्वर स्क्रीन की त्रिमूर्ति कहे जाने वाले मनोज तिवारी, रवि किशन और निरहुआ तीनों राजनीति में उतर चुके हैं. मनोज तिवारी ने सपा से शुरुआत की. पहला चुनाव हारे और फिर बीजेपी में आ गए. रविकिशन ने जौनपुर से कांग्रेस के टिकट पर दांव आजमाया था. नाकामी के बाद वे भी बीजेपी में आ गए. निरहुआ ने सीधे बीजेपी में ही इंट्री ली है.

सुपरहिट फिल्म निरहुआ रिक्शावालाश् में उनके एक डायलॉग पर धुआंधार तालियाँ बजती थी- श्जे ना गरीब संगे करी इन्साफ हो रहेला निरहुआ बस ओकरे खघ्लिाफ हो. देखना दिलचस्प होगा कि ऐसे डायलॉग तालियों के साथ-साथ उन्हें वोट भी दिला पाते हैं या नहीं.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.