अर्जियों के साथ नत्थी रूपया आखिर जाता कहाँ है

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डा0 नरेन्द्र तिवारी (स्वतंत्र पत्रकार)
gurujidrnarendra@gmail.com

गरीब को लूटना सबसे आसान है और वर्तमान सामाजिक परिप्रेक्ष्य में बेरोजगार को गरीब की श्रेणी में रखना शायद गलत नही होगा। अपने देश कीजो सामाजिक परिस्थितियां हैं रोजागारकी जो स्थिति है उसमें बहुत कम बेरोजगार होते हैं जो अपने भविष्य को लेकर आत्म लेकर आत्म विश्वास से लबरेज होते हैं अधिकांश में हताशा और निरशा के भाव का होना बिल्कुज होते हैं अधिकांश में हताशा और निरशा के भाव का होना बिल्कुल अस्वाभाविक नही है।

यह बेरोजगार गरीब लूटा जा रहा है ये लूटा जा रहा है ये तो सभी जानते हैं लेकिन इसको लूटने वाले कोई अपराधी नही बल्कि हमारी सरकारें भी शामिल हैं। केन्द्र हो या फिर कोई राज्य सरकार , देश के किसी भी हिस्से में बेरोजगारों को ठगने का सिूटने वाले कोई अपराधी नही बल्कि हमारी सरकारें भी शामिल हैं।

केन्द्र हो या फिर कोई राज्य सरकार , देश के किसी भी हिस्से में बेरोजगारों को ठगने का सिलसिला सततरूप से जारी है। सुनने में यह बात खराब लग रही है और यकीन करना भी मुश्किल है। लेकिन अक्षरशः नही तो किसी न किसी हद तक इस बात में कुछ न कुछ सच्चाई अवश्य है।

संघ लोक सेवा आयोग हो, या उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग या भारत के किसी भी राज्य का लोक सेवा अथवा अधीनस्थ चयन बोर्ड। यह सवाल कभी किसी ने न तो संसद में उठाया और न ही किसी राज्य की विधान सभा में इस पर बहस हुयीकि आखिर कोई भी भर्ती बोर्ड जब सरकार से अभ्यर्थियों के लिये आवेदन पत्र मांगते हेै तो उसके साथ परीक्षाशुल्क के रूप् में बैंक ड्राफ्ट/ पोस्टल आर्डर या आनलाइन धनराशि क्यों मांगी जाती है।

कोेई भी सरकार या कम्पनी अपने लिये नौकर को तलाश करती है यानि की पहला स्वार्थ सरकार या कम्पनी का होता है। ठीक है कि बेरोजगार को रोजगार चाहिये जगार चाहिये लेकिन सरकार या कम्पनी को तो नौकर चाहिये । तो पहली आवश्यकता सरकार की है या कम्पनी की । इस दशा में सरकार या कम्पनी को बेरोजगार को परीक्षा या साक्षात्कार के लिये बुलाने का खर्च स्वयं उठाना चाहिये न कि बेरोजगारों के मत्थे मढ़ देना चाहिये।

एक दूसरा पक्ष वो यह है कि बेरोजगार अभ्यर्थी से प्राप्त धनराशि आखिर जाती कहां हैं। किसी सरकार ने अभी तक संघ लोक सेवा आयोग या राज्यों के अिभी तक संघ लोक सेवा आयोग या राज्यों के लोक सेवा आयोग और विभिन्न भर्ती व चयन वोर्डो के खर्च आदि का व्यौरा क्यों नही पट के खर्च आदि का व्यौरा क्यों नही पटल पर रखा इसलिये कि बेरोगार सबसे कमजोर और निरीह है।

उसकी आंखों में सपने है जिन्हे सरकार या कोई कम्पनी ही पूरा कर सकती है। और वह इस स्थिति में कभी भी नही आ पाता कि वह सरकार या कम्पनी से यह सवाल पूँछे कि अभ्यर्थियों से प्राप्त की गयी धनराशि का क्या किया गया।

यह बात एक उदाहरण से समझी जा सकती है। यह बात एक उदाहरण से समझी जा सकती है। मान लीजिये कि उ0प्र0 लोक सेवा आयोग ने प्रान्तीय सिविल सेवा के 100-125 पद का विज्ञापन निकाला। इन पदो ंके लिये 9,00,000 अभ्यर्थियों ने आवेदन भरा । प्रत्येक अभ्यर्थी से आयोग ने परीक्षाशुल्क के नाम पर 200रू0 प्राप्त किये तो इस हिसाब ये धनराशि 18 करोड़ हुयी आयोग वर्ष भर सिविल सेवा के अभ्यर्थियों ने आवेदन भरा ।

प्रत्येक अभ्यर्थी से आयोग ने परीक्षाशुल्क के नाम पर 200रू0 प्राप्त किये तो इस हिसाब ये धनराशि 18 करोड़ हुयी आयोग वर्ष भर सिविल सेवा के अलावा विभागवार परीक्षायें कराता ही रहता है। उसी बेरोजगारों से वार्षिक आय कितनी हुई।

हर साल बेरोगारोें से हजारों करोड़ रूपये कमाने वाले यह आयोग और भर्तीबोर्ड अभ्यर्थियों को परीक्षा के लिये कमाने वाले यह आयोग और भर्तीबोर्ड अभ्यर्थियों को परीक्षा के लिये विभिन्न शहरों मे बुलये विभिन्न शहरों मे बुलाते हैं ताूे उन्हें एक पैसा यात्रा के लिये नही देते हैं । निरीह वेरोजगारों पर आयोग का इतना क्रूर रवैया होने के बावजूद हर ओर सब सामान्य रहता है न संसंद इस पर बोलती है न विधान सभा न कोई अखबार इस पर लेख लिखता है न टीवी पर ये कोई विषय है बहस के लिये ।

दरअसल यही सबसे बड़ी समस्या अपने देश की कि जो मुद्दे वास्तव में प्रासंगिक होते हैं , सामाजिक सरोकार से जुड़े होते हैं बहस या चर्चा उन पर न होकर उन मुद्दो के इर्द गिर्द के विषयो तक सीमित हो जाती है । इसका सबसे बड़ा और कडुवा दुष्प्रभाव यह है कि मुददे कभी समाप्त ही नही होते। बेरोजगारी भी इसइिसका सबसे बड़ा और कडुवा दुष्प्रभाव यह है कि मुददे कभी समाप्त ही नही होते। बेरोजगारी भी इसलिये दूर नही हो रही है क्योंकि कभी आबादी तो कभी शिक्षा और कभी स्किल पर अनावश्यक बात होती है.

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