ईवीएम फिर राजनीतिक रागिनी, क्या विपक्षी दलों ने पहले दौर के मतदान के बाद ही मोदी से हार मान ली

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  • गैर भाजपा शासित राज्यों में ईवीएम में गड़बड़ी कैसे हो सकती है?

  • क्या कांग्रेस और विपक्षी दलों ने पहले दौर के मतदान के बाद ही मोदी से हार मान ली है?

  • अशोक गहलोत, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक जैसी मुख्यमंत्री क्या अपने मातहत अफसरों को गडबड़ी करने की छूट देंगे?

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14 अप्रैल को कांग्रेस सहित कुछ विपक्षी दलों ने एक बार फिर ईवीएम का मुद्दा उठाया है। कपिल सिब्बल, अरविंद केजरीवाल, चन्द्रबाबू नायडू जैसे घाघ नेताओं का कहना है कि ईवीएम पर बटन दबाने के अनुरूप वोट दर्ज नहीं हो रहा है। ऐसे में लोकसभा चुनाव मतपत्र से करवाए जाएं या फिर वीवीपेट की पचास प्रतिशत पर्चियों का मिलान ईवीएम में दर्ज वोटों से करवाया जाए।
समझ में नहीं आता कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को ईवीएम पर शक क्यों हो रहा है? ऐसे नेता भले ही मीडिया में अपनी बेतुकी बाते प्रसारित करवा लें लेकिन हकीकत यह है कि गैर भाजपा शासित राज्यों ेमं तो ईवीएम पूरी तरह कांग्रेस और विपक्षी दलों के कब्जे में हैं।
अब मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा के पास जादू की ऐसी कोई छड़ी तो है नहीं कि घुमाते ही ईवीएम के वोट भाजपा को मिल जाएंगे? कुछ बुद्धिजीवी और स्वयं को प्रगतिशील पत्रकार मानने वाले लोग तर्क दे रहे हैं कि भाजपा छोड़ कर सभी विपक्षी दल ईवीएम की प्रक्रिया से संतुष्ट नहीं है।
मुझे ऐसे लेखाकारों (अकाउटेंट न समझे) की अक्ल पर तरस आता है। मैंने जिला स्तर पर भी पत्रकारिता की है, इसलिए मुझे पता है कि मतदान से पहले एक ईवीएम को कितनी जटिल प्रक्रिया से होकर गुजरना पड़ता है। देश में जो प्रशासनिक व्यवस्था है उसके अंतर्गत राज्य सरकारें ही चुनाव करवाती हैं।
सात राज्यों में कांग्रेस की सरकार है और ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, चन्द्रबाबू नायडू, के चन्द्रशेखर राव जैसे मुख्यमंत्री अपने अपने में काबिज हैं। चुनाव प्रक्रिया में शामिल चपरासी से लेकर कलेक्टर और मुख्य सचिव तक इन्हीं मुख्यमंत्रियों ने तय किए हैं। आजकल राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कुछ ज्यादा ही प्रखर हैं। प्रधानमंत्री की आलोचना करने में कांगे्रसी मुख्यमंत्रियों में गहलोत सबसे आगे हैं।
क्या ऐसे मुख्यमंत्रियों के रहते नरेन्द्र मोदी ईवीएम में गड़बड़ी करवा सकते हैं? अक्ल के अंधों को यह भी समझना चाहिए कि इन्हीं ईवीएम से कांग्रेस ने तीन माह पहले राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में सरकारें बनाई है। लोकसभा चुनाव में भी वे ही ईवीएम है जो विधानसभा चुनाव में काम आई थीं।
जब विधानसभा चुनाव में भाजपा की सरकार रहते कोई गड़बड़ी नहीं हुई तो फिर लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की सरकारों के समय कैसे हो सकती है? सत्ता पलटते ही राजस्थान में अशोक गहलोत, मध्यप्रदेश के कमलनाथ और छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल ने कलेक्टर जैसे महत्वपूर्ण पदों पर अपने भरोसे के अफसरों की तैनाती की है।
कलेक्टर ही अब जिला निर्वाचन अधिकारी की भूमिका निभा रहे हैं। कांग्रेस और विपक्षी दलों की सरकार में क्या किसी निर्वाचन अधिकारी की हिम्मत ईवीएम में गड़बड़ी करने की है? जो ईवीएम विपक्षी दलों के कब्जे में हैं उनमें गड़बड़ी कैसे हो सकती है?
यदि जरा सी भी शंका होगी तो कांग्रेसी मुख्यमंत्री सबसे पहले गड़बड़ी वाली ईवीएम को हटवाएंगे। ममता बनर्जी के पश्चिम बंगाल में तो पूरा निर्वाचन विभाग ही दीदी के इशारे पर नाच रहा है, इसलिए तो अमितशाह और राहुल गांधी जैसे नेताओं तक के हैलीकॉप्टर उतरने नहीं दिए जा रहे हैं।
ईवीएम में गड़बड़ी की आशंका को सुप्रीम कोर्ट ने भी नकार दिया है। ऐसे में सभी आरोप बेमानी है। ऐसा प्रतीत होता है कि लोकसभा चुनाव के पहले दौर के मतदान के बाद कांग्रेस और विपक्षी दलों को हार नजर आ गई है। इसलिए अभी से हार के कारण तलाशें जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किस तरह से हो राहा है यह किसी से छिपा नहीं है।
एस.पी.मित्तल) (15-04-19)
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