आखिरकार…..नोट बंदी से कौन हुये लाभान्वित?

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मोदी के नोटबंदी के ब्रह्मास्त्र को उन्ही के सलाहकारो सहयोगियों एवं सिस्टम ने नष्ट कर डाला।
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आज नोटबंदी का विरोध्ा करने वाले अर्थशास्त्रियों का अधर््ाशास्त्र सामने आ चुका है, नोटबंदी से देश को भारी क्षति होगी इस प्रकार की घोषणाये सत्य साबित होने लगी है, लेकिन मोदी की घोषणाये एवं उनका अर्थशास्त्र क्या था? यह अभी तक सामने नही आ सका है।
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नोटबंदी के बाद थोड़ा बहुत कष्ट उठाने मात्र से कालाध्ान सफेद हो गया और जमाखोरी की लटकती तलवार से भी मुक्ति मिल गई, दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि नोटबंदी भ्रष्टाचारियों के लिये एक तोहफा बनगई।
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दो हजारा के नोटो को छापने से कालाध्ान कुबेरो को ही लाभ मिला है, बड़े नोट रिश्वत लेने और देने को आसान बनाते हैं, बड़े नोटो को डंप करना भी आसान होता है, बड़े नोटो में ही कलाध्ान होता है, आज 2000 के नोटो के गायब से होने के पीछे यही रहस्य है कि नोटबंदी के बाद में कालेध्ान में इजाफा हुआ है।
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जी.डी.पी. और सरकारी आंकड़ो का ढिंढोरा पीटकर भारत को आर्थिक महा शक्तियों में करने का सपना देखना अथवा दिखाना एक खूबसूरत ध्ाोखा ही है, मुखिया संपन्न है परिवार भूखा है इसके क्या मायने है?
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जमील असकरी

मोदी का नोटबंदी का अहम फैसला समय बीतने के साथ ही भारत के लिये एक कलंक साबित होता जा रहा है, मोदी ने नोटबंदी की घोषणा कर यह एलान किया था कि उनका यह फैसला कालेध्ान पर एक बड़ा हमला है, इसके आलोचक अर्थशास्त्रियों के लिये कहा था कि नोटबंदी का फैसला एक ऐसा अर्थशास्त्र है, जो आम अर्थशास्त्रियों के समझ से परे है,

लेकिन आज रिजर्ब बैंक के ही अनुसार प्रतिबंध्ाित नोट में से 99.3 प्रतिशत नोट बैंको में बापिस आ गये, शेष नेपाल एवं भूटान के बैंको द्वारा बदले जाने के क्यास लगाये जा रहे हैं, प्रतिबंध्ाित नोट की बापिसी का आंकड़ा तो यही साबित कर रहा है कि भारत में कालाध्ान था ही नही ंतो फिर मोदी ने नोटबंदी का ब्रह्मास्त्र क्यू छोड़ा?

इसे जानने का हक प्रत्येक भारतीय का बनता है, प्रतिबंध्ाित नोट बदलने के लिये घंटो लाइन में शंाति पूर्वक लगे खड़े रहे लोगों कोअब यह बताना ही चाहिये कि यदि उनके भारत में कालाध्ान था, तो उनके नोटबंदी के ब्रहमास्त्र को छोड़ने के बाद वह कहा गया ? वह सामने क्यू नहीं आया। साथ ही उन्हे यह भी बताना चाहिये कि नोट बंदी का उनका क्या अर्थशास्त्र था ? जो आम अर्थशास्त्रियों के समझ से परे था,

आज नोटंबदी का विरोध्ा करने वाले अर्थशास्त्रियों का अर्थशास्त्र सामने आ चुका है, नोटबंदी से देश को भारी क्षति उठानी पड़ेगी, उनकी इस प्रकार की घोषणायें सत्य साबित होने लगी है, लेकिन मोदी का नोटबंदी के संबंध्ा में अर्थशास्त्र क्या था ? वह अभी तक सामने नहीं है, नोटबंदी से भारत में अच्छे दिन आयेगे मोदी की इस घोषणा की भी हवा निकल गई,ऐसे में मोदीके अहम फैसले नोटबंदी पर आरोप लग रहे है, और इसे देश का एक बड़ा घोटाला कहा जा रहा है, तो इसमें दोष आरोप लगाने वालो का क्या हो सकता है ?

यह सच्चाई है कि जब-जब राजनीति को जन सेवा का सशक्त माध्यम बताने वालो की भीड़ में बढ़ोत्तरी हुई तब-तब भ्रष्टाचार एवं व्यभिचार मंे भी बढ़ोत्तरी हुई है, जबकि जनसेवा की बाढ़ से जन समस्याओं में कमी आनी चाहिये, जन समस्यायों में कमी लाने के वायदे पर ही मोदी को भारतीय जनता ने ताज पहनाया, मोदी ने नोटबंदी के समय आई दिक्कतो को शांति से झेलने की जनता से मार्मिक अपील की थी,

बार-बार स्थिति सामान्य करने के लिये समय को बढ़ाने का कार्य भी किया था जिसे जनता ने अच्छे दिन एवं कालेध्ान के सामने आ जाने की आस लगाकर सहर्ष स्वीकार किया था, आज उसी सहनशील जनता को मोदी को यह बताने की आवश्यकता बनती है कि उनकी नोटबंदी की अति महत्वांकाक्षा योजना से उसे अब तबाही का रास्ता क्यू दिख रहा है? उसके छोटे-छोटे उद्योग ध्ांध्ो क्यू बंद हो रहे है ? गरीब और गरीब क्यू हो रहा है ?

उसकी बचत के पैसे तो सामने आ गये लेकिन कालेध्ान कुबेरो का ध्ान सामने क्यू नहीं आया? उनका कालाध्ान कहां गया? अच्छे दिन के बजाये बेरोजगारी का विकराल रूप कैसे सामने आ खड़ा हुआ है? क्या मोदी का नोटबंदी का अर्थशास्त्र सिर्फ चुनाव में जीत हांसिल करने के लिये उन दलों पर प्रहार तो नही था ?

जो अपने पास संरक्षित ध्ान का उपयोग कर चुनाव जीतने में सफलता पा लेते थे, 2017 में सम्पन्न हुये विध्ाान सभाओं के चुनाव परिणाम इसका सबूत तो नहीं है? नोटबंदी के बाद सभी दलों की आर्थिक स्थिति में गिरावट आई है, लेकिन भाजपा की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई है, वह कैसे क्या इसे बताने का साहस आज उन्हें दिखाना चाहिये।

जन सेवाओ की बात कर राजनीति में आने वाले नेताओ के झांसे में आकर जनता उन पर अटूट विश्वास करती है, लेकिन काजल की कोठरी में आते ही उनका रंग बदलने लगता है, वह भी सत्ता के रंग मंे रंग जाते है, तब जनता फिर एक बार बीच चैराहे पर आजाती है, और कोई नया रास्ता खोजने लगती है, लेकिन उसे फिर कोई झांसा देने वाला मिल जाता है, और वह फिर लुटने लगती है, ऐसा ही उसके साथ बार-बार होता है,

साफ सुथरी छवि एवं जनसेवा की बात करने वाले मोदी पर भी अब भ्रष्टाचारियों एवं सत्ता की महत्वाकांक्षा पाले हुये, कुछ राजनेताओ से घिरे रहने के आरोप लगने लगे हैं, आरोप लगाने वालो का कहना है कि यदि ऐसा नही होता तो नोटबंदी की अचानक घोषणा कालेध्ान को बाहर लाने का कार्य कर सकती थी, लेकिन मोदी के कुछ चाटुकार नेताओं ने इसे असफल कर दिया, ऐसे ही लोगो ने आर वी आई के गवर्नर रघुराम राजन जो भ्रष्टाचार के प्रवल विरोध्ाी थे,

लेकिन नोटबंदी के समर्थक नही थे, को एक षडयंत्र के तहत बाहर करा दिया, इससे बड़ा आश्चर्य क्या हो सकता हे? कि नोटबंदी की योजना की हवा निकालने मंे स्वयं आर बी आई के लोगो के चेहरे सामने आये, देश का कोई भी बैन्क नोटबंदी में अपने को भ्रष्टाचार से सुरक्षित नही रख सका, उद्योग पतियांे, व्यापारियों, नौकरशाहो, राजनीतिक नेताओं का ध्ान काले से सफेद हो गया, तभी तो बैंको के पास प्रतिबंध्ाित नोट 99.3 प्रतिशत वापिस आ गये,

यह सेवा शुल्क का ही कमाल है, जिसे मोदी सरकार नही रोक पाई, नोटबंदी के बाद थोड़ा बहुत कष्ट उठाने के बाद कालाध्ान सफेद हो गया, जमाखोरी की लटकती तलवार से भी मुक्ति मिल गई, दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि नोटबंदी भ्रष्टाचारियों के लिये एक तोहफा बन गई, वही इससे लाभान्वित हुये लोग बिना मोल के केन्द्र सरकार के जरखरीद गुलाम हो गये,

आम साध्ाारण नागरिक इसी मुगालते में रहा कि काला ध्ान निकालने के लिये नोटबंदी से अच्छा विकल्प और कोई हो ही नही सकता, इसी कारण नोटबंदी से देश एवं आम नागरिको को भारी क्षति होगी की आवाज आमनागरिकों के कान के अन्दर नही जा सकी उसने नोटबंदी का विरोध्ा नहीं किया और मोदी सरकार के दोनो हांथो में लड्डू आ गये।

नोटबंदी की घोषणा यह कह कर की गई थी कि चलन के नोटो मंे कालाध्ान छिपा है, मोदी ने 500 और 1000 के चल रहे नोटो को एक कागज का टुकड़ा बना दिया जिसकी कोई कीमत नहीं रही, 1000 के नोट के बदले 2000 का नया नोट प्रचलन में आ गया, जिसने आम नागरिक को खूब नाच नचायेगा,

अस्तित्व में आने के बाद उसे भुनाने में काफी चक्कर पहले लगाने पड़े और आज उसके दर्शन दुर्लभ हो गये, बैंक एवं बाजारों मं 25 से 30 प्रतिशत इसका चलन रह गया बाकी के 65 से 70 प्रतिशत यह नोट कहा गया ? यह एक विचार्णीय प्रश्न है, जाहिर है जो चीज बाजार से गायब होती है वह कही न कही जखीरे के रूप में आ जाती है,

कालेध्ान कुबेरो ने इसे डंप कर रखा है, 2000 के नोट छपने से कालेध्ान कुबेरो को ही लाभ मिला है, 2000 का नोट रिश्वत लेने और देने को आसान बना रहा है, यह बहुत स्पष्ट है कि काले ध्ान को बड़े नोट में ही छुपाया जाता है, डंप किया जाता है, इस बात से मोदी और उनके सलाह कार अनभिज्ञ तो नहीं हो सकते फिर 1000 के नोट बंद कर 2000 के नोटो को चलन में लाना कौन सा अर्थशास्त्र था?

यह सवाल तो उनसे पूंछा ही जा सकता है, नये नोट छापने के समय मोदी सरकार ही नहीं आर बी आई ने भी यह दाबा किया था कि इन नोटो की नकल कर नकली नोटो को नही बनाया जा सकता, लेकिन 2000 के नोट के चलन में आते ही नकली नोट सामने आ गये जो पकड़े भी गये, नये नोटो की गुणवत्ता क्या है? यह भी उस समय सामने आ जाती है जब यह थोड़ा सा ही भीनने पर रंग छोड़ बदरंग हो जाते हैं,

जिन्हें कोई लेने को तैय्यार नहीं होता यहां तक बैंक भी नहीं, इससे तो यही स्पष्ट होता है कि मोदी के ब्रहमास्त्र को उनके अज्ञात अर्थशास्त्र, सलाहकारो एवं सिस्टम ने नष्ट कर डाला। सादगी सरलता और ईमानदारी वर्तमान राजनीति में घोर मूर्खता और शासकीय मानसिकता के सर्वथा विपरीत है, राजनेता सेवा भाव से राजनीति में प्रवेश करते है,

यह मानना काफी दूर की कौड़ी है, लाल बहादुर शास्त्री एवं गुलजारी लाल नंदा ऐसे सेवा भाव के नेता अपने जीवनकाल में भ्रष्टाचार को नही मिटा सके, लम्बे समय तक गुलामी का दंश झेलने वाली भारतीय जनता का यह मानना कि शासन एवं सत्ता सभालने की क्षमता शक्तिशालियो में ही होती है, तभी जीरो टारलैन्स की छवि वाले नेताओं का उभार होता है, लेकिन जब वह सत्ता में आते है, तब वह चाटुकारिता से अपने को परे नही रख पाते, चाटुकारिता उनके सेवा भाव एवं जीरो टारलैन्स को दीमक की भांति चाट जाती है और यही से ब्रह्मास्त्र सफल होने के बजाये असफल होने लगते हैं,

मोदी का नोटबंदी का ब्रह्मास्त्र भी इन्ही कारणों से असफल हो गया, इसे अब स्वीकार कर लेना चाहिये। उन्हें अब जी डी पी और सरकारी आकड़ो के ग्रोथ का ढिंढोरा पीट कर भारत को महाशक्तियो में शामिल करने का दिन में सपना देखना बंद कर देना चाहिये, क्योकि उनका यह सपना एक खूबसूरत ध्ाोखा है, परिवार के मुखिया के संपन्न होने के बाद भी उसका परिवार यदि भूखा नंगा रहे, तो परिवार के मुखिया की सपन्नता के कोई मायने नहीं रहते, कुछ ऐसे ही हालातों से आज भारत गुजर रहा है, उसे देखने की आवश्यकता है।

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