आज से आरम्भ है शारदीय नवरात्र, प्रथम दिन होगी माँ शैलपुत्री की पूजा अर्चना

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आज से शारदीय नवरात्र आरम्भ है।  नवरात्र का पहला दिन है। जनपद के अनेक देवी मंदिरो में नवदुर्गा के पूजा- अर्चना को लेकर कई दिनों से तैयारियां चल रही थी। नगरक्षेत्र सहित अनेक ग्रामो में नवदुर्गा की प्रतिमा पांडालों और मंदिरो में स्थापित कर इनकी पूजा अर्चना 9 दिनों तक होगी। नवरात्र में मांदुर्गा के 9 अलग अलग रूपों की बिधि-बिधान से पूजा अर्चना होती है। माँ शैलपुत्री ही नव दुर्गाओ मे प्रथम दुर्गा है। नवरात्र के प्रथम दिन की उपासना मे योगी अपने मन को ‘मूलाधार’ चक्र में स्थित करते है।

मां शैलपुत्री पार्वती का ही अवतार है। दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान होने के बाद सती योगाग्नि में भस्म हो गई थी, जिसके बाद उन्होंने हिमालय के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया। पर्वत की पुत्री होने के कारण उन्हें शैलपुत्री कहा जाता है। कई लोगों को यह नहीं पता होता कि कौन से दिन किस देवी की पूजा करनी है और किस विधान से करनी है। अगर आप मां दुर्गा के पहले स्वरूप की पूजा पूरे विधि विधान से करते है तो आपको मिलने वाला फल दोगुना हो जाएगा। कहा जाता है कि महिलाओं के लिए मां शैलपुत्री की पूजा काफी शुभ मानी गई है।

नवरात्र में 9 दिन व्रत रहकर माता की पूजा बड़े ही श्रद्धा भाव के साथ की जाती है। ऐसा इसलिए क्योंकि कुछ नवरात्र में सिर्फ पहला और आखिरी व्रत रखते हैं। जो लोग 9 दिन व्रत नहीं रह पाते वे सिर्फ माता शैलपुत्री का पूजन कर नवरात्रि का फल पा सकते है। दुर्गा को मातृ शक्ति यानी स्नेह, करूणा और ममता का स्वरूप मानकर पूजा की जाती है।

ऐसा कहा जाता है कि मां शैलपुत्री अपने पूर्वजन्म में प्रजापति दक्षराज की कन्या थीं और तब उनका नाम सती था। आदिशक्ति देवी सती का विवाह भगवान शंकर से हुआ था। एक बार दक्षराज ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया था जिसमें सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया, लेकिन शंकर जी को नहीं बुलाया था।

क्रोध से भरी सती जब अपने पिता के यज्ञ में गईं तो दक्षराज ने भगवान शंकर के विरुद्ध बहुत अपशब्द कहा। देवी सती अपने पति भगवान शंकर का अपमान सहन नहीं कर पाईं। उसके बाद उन्होंने वहीं यज्ञ की वेदी में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए।

अगले जन्म में देवी सती शैलराज हिमालय की पुत्री बनीं और शैलपुत्री के नाम से जानी गईं। जगत-कल्याण के लिए इस जन्म में भी उनका विवाह भगवान शंकर से ही हुआ। पार्वती और हेमवती उनके ही अन्य नाम हैं। आदि शक्ति के इस रूप का जन्म शैलपुत्र हिमालय के घर हुआ था, इसी वजह से इनका नाम शैलपुत्री रखा गया।

शैलपुत्री नंदी नाम के वृषभ पर सवार होती हैं और इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प है। नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा होती है। मां शैलपुत्री को अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। अगर हमारे जीवन में स्थिरता और शक्ति की कमी है तो मां शैलपुत्री की पूजा जरूर करनी चाहिए। महिलाओं के लिए मां शैलपुत्री की पूजा काफी शुभ मानी गई है।

Hindmorcha Digital Team 

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