“खाकी वर्दी वाला गुण्डा” बनी पुलिस का चाल-चेहरा-चरित्र बदलने की चुनौती

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Chief Editor : Hindmorcha Group of Publication
Pradeep Kumar Pathak
प्रदीप कुमार पाठक

विवेक तिवारी हत्याकाण्ड ने यह विचार करने के लिये मजबूर कर दिया है कि पुलिस आज निरंकुशए क्रूर एवं हिंसक या कहें कि खाकी वर्दी वाला गुण्डा क्यूं बनती जा रही है
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पुलिस का राजनीतिकरण करना फिर उसका दुरूपयोग करने के लिये उसे खुली छूट देना, पुलिस को अपने कर्तव्यों से भटकने का रास्ता बन चुका है।
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भारत में अंग्रेज शासन करने आये थे, उन्हें अपनी बात मनवाने के लिये एक दमनकारी पुलिस चाहिये थी, सो उन्होंने वैसी व्यवस्था बनायी थी पर आज जब हम आजाद हैं, जनता की सेवा करना सत्ताधीशो का कर्तव्य है, तब दमनकारी प्रवृति की पुलिस के रवैय्ये को बदलने में चूक क्यू की जा रही है।
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सूचना क्रांति के दौर में पुलिस कर्मियों के चरित्र में सुधार न होनाए सभ्य समाज के लिये खतरनाक है।
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देश में वाह्य एवं आन्तरिक सुरक्षा एक बड़ा प्रश्न हैए नक्सल एवं आतंकवाद दो बड़ी चुनौतिया हैए जिससे निपटने के लिये पुलिस व्यवस्था में सुधार करना एक बड़ी आवश्यकता बन गई है।
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उ0प्र0 की राजधानी लखनऊ में एक सिपाही ने एपल कंपनी के एरिया सेल्स मनैजर विवेक तिवारी को गोली से उड़ा दिया, वह भी तब जब उसने कोई खता नही की थी, इस घटना ने केवल सनसनी ही नही फैलाई, बल्कि यह सोंचने के लिये मजबूर कर दिया, कि खाकी बर्दी धारक यानि पुलिस जिसके कंधो पर वाह्य एवं आन्तरिक सुरक्षा ही नही कानून व्यवस्था को चुस्त दुरूस्त रख अमन चैन कायम करने का भार होता है वह आज निरंकुश क्रूर एवं हिंसक कैसे बन रही है?

एक लोकतंत्रीय राष्ट्र के सबसे बड़े प्रदेश की राजधानी में खाकी बर्दी धारक पुलिस सिपाही को एक सम्मानित व्यक्ति पर सीधी गोली चलाने का साहस कहा से आया ? सीधी सी बात है जब पुलिस का राजनीतिकरण कर उसका दुर्पयोग किया जायेगा,उसे छूट दी जायेगी तो वह अपने कर्तव्यों को भूलकर अन्याय, शोषण एवं अपराध तो करेगी ही।

तानाशाह बन जाती है चुनी हुई सरकारें

आजादी से पहले की पुलिस और आज की पुलिस में खोजने से भी फर्क नहीं मिलता। वह पहले भी निरंकुश बर्बर और हिंसक थी,आज भी निंरकुश बर्बर और हिंसक है, उसका चेहरा पहले भी मानवीय नहीं दिखता था, आज भी नही दिखता है, वह पहले भी आम अपराधियों से कहीं अधिक खंूखार अपराधी के रूप में दिखती थी, आज भी उसी रूप में दिख रही है, अंग्रेज शासन करने आये थे, उनका शासन दमनकारी था।

उन्हें दमन चक्र चलाने के लिये दमनकारी पुलिस की आवश्यकता थी, आज हम आजाद है हमारे द्वारा ही चुनी गई सरकारे हैं, बाबजूद इसके आज पुलिस का चेहरा अंग्रेजो की पुलिस के भांति ही दिख रहा है, आखिर क्यूं? और कैसे ? इसका जबाव सिर्फ एक है, कि आजादी के बाद भी जितने नियामक हमारे देश में सामने आये वह देखने भर के है, वह स्वतंत्रता के दुर्पयोग से तानाशाह बन चुके हैं.

आज भी हमारे लोगों द्वारा चुने गये लोगों को अपने विरोधियों को सबक सिखाने के लिये अपने कुकृत्यो पर पर्दा डालने के लिये दमनकारी क्रूर बर्बर एवं हिंसक प्रकृति की पुलिस की आवश्यकता है, यदि ऐसा नही ंतो 1977 में पुलिस व्यवस्था में सुधार लाने के लिये बना राष्ट्रीय आयोग अभी तक कोई सकारात्मक परिणाम क्यू नहीं दे पाया ? वह केवल खाना पूर्ति का माध्यम बनकर क्यू रह गया ?

सर्वोच्च अदालत ने भी कई दिशा निर्देश दिये

पुलिस व्यवस्था में सुधार लाने के लिये देश की सर्वोच्च अदालत ने भी कई दिशा निर्देश दिये, लेकिन उन पर किसी भी दल की केन्द्र अथवा राज्य सरकारों ने अमल नहीं किया, अदालत की झाड़-फटकार का सरकारो पर असर न पड़ना, कुछ ऐसा ही संदेश दे रहा है कि वह पुलिस व्यवस्था में सुधार लाने के इच्छुक नहीं है, आज पुलिस स्वयं अपराधी बन गई है, आम आदमी उसके सामने खड़े होने में भय खाता है, वह उससे न्याय मिलने की आशा नहीं करता.

देश अपने आपको विश्व की बड़ी शक्तियों में देखने की कोशिश कर रहा है, परन्तु क्या आज की पुलिस व्यवस्था इसको साकार होने देगी? अमेरिका और यूरोप की पुलिस अपराध के तह तक पहंुच जाती है, उससे अपराधी छूट नही पाता, परन्तु हमारे देश में कुछ उल्टा ही नजारा है,यहां की पुलिस पीड़ित को न्याय दिलाने के बजाये उसका शोषण करती है, अपराधियों को सरंक्षण देती है, अपराधों को छुपाने के लिये सारीसीमाओं को लांघ जाती है,

जन-आलोचनाओं का शिकार बनने से बचने के लिये निर्दोश लोगो ंकी गर्दन ही नाप देती है, वह अपराध कराकर बसूली करती है,ऐसा हो रहा है, यह सब राज्य सत्ताये जानती है, फिर भी वह अपने शासन काल में पिछली सरकारों से कही अधिक कानून व्यवस्था का चुस्त-दुरूस्त होने का दाबा करती है, जबकि आम आदमी यही अहसास कर रहा है कि कानून व्यवस्था दिनो दिन ध्वस्त हो रही है। वह असुरक्षित है,उस पर दोहरी मार पुलिस एवं अपराधियों की पड़ रही है।

लखनऊ के विवेक हत्याकांड ने कानून के राज की पोल खोल दी है, पुलिस का असली रूप सामने ला दिया है, इससे पहले भी प्रदेश में ऐसी कई घटनाये हो चुकी है, जिसने खाकी बर्दी का रंग काला किया है, विवेक के भांति मैनुपरी में एलाऊ थाना क्षेत्र के गांव लेखराजपुर के अनुज कुमार एक रात बाइक से एलाऊक्षेत्र से गुजर रहे थे, तभी चैकी जागीर के सिपाही सुधीर यादव एवं ताहर सिंह ने चैकिंग के नाम पर रोका और उस पर झपट पड़े, अनुज भयभीत हो गया,उसने बाइक नही रोकी सिपाहियो ंने उस पर गोली चला दी जिससे उसकी मृत्यु हो गई.

यह घटना योगी आदित्यनाथ के काल मंे नही हुई, यह घटना 2013 में अखिलेश यादव के कार्यकाल में हुई, सिपाहियों पर हत्या का मुकद्दमा न्यायालय में विचाराधीन है, योगी के कार्यकाल मंे इसी वर्ष नोएडा के जिम टेªनर जितेन्द्र यादव जो अपने दोस्त के साथ कार से जा रहे थे, उन्हें पुलिस एस आई विजय दर्शन एवं अन्य गश्ती पुलिस ने रोकर बदमाश होने का हल्ला कर उनके गले में गोली मार दी जिससे उनकी मृत्यु हो गई.

विवेक के भांति जितेन्द्र यादव का एनकाउंटर हुआ, वह बदमाश था, यह साबित करने का पुलिस ने भरस्क प्रयास किया, जिस प्रकार विवेक तिवारी की हत्यारी पुलिस को पुलिस के बरिष्ठ अधिकारियों ने प्रारम्भ मंे बचाने का प्रयास किया, ठीक इसी प्रकार जितेन्द्र यादव की हत्यारी पुलिस को बचाने का प्रयास किया गया, लेकिन हंगामा होने पर जितेन्द्र के हत्यारे पुलिस दरोगा को हत्या करने के अपराध में गिरफ्तार करना पड़ा, कई अन्य पुलिस कर्मियों पर गाज गिरी.

इसी वर्ष मथुरा के हाइवे के गांव मोहनपुर अडूकी में बदमाशों को पकड़ने के नाम पर पुलिस ने गोलियां चलाई जिसमे एक आठ वर्षीय माधव गंभीर रूप से घायल हो गया, गोली चलाने वाली पुलिस वहां से घायल बालक को और एक पुलिस दरोगा वीरेन्द्र यादव को छोड़कर भाग गई, उसकी मृत्यु हो गई घटना को दबाने का काफी प्रयास किया गया, आलोचना शुरू हुई, जन आक्रोश फैल गया, तब कही जाकर एस आई सौरभ, सिपाही अजय और सुभाष को निलंबित कर सम्पूर्ण घटना की जांच सी बी सी आई डी को सौंप दी गई.

इसी वर्ष एक आडियो वायरल हुआ, जिसमें एक वांछित अपराधी लेखराज यादव से पुलिस इंस्पेक्टर सुनील कुमार सिंह एनकाउंटर की डील करते हुये देखे गये, इस अपराधी और पुलिस के गठजोड़ ने जब तूल पकड़ा, तो इंसपैक्टर को बर्खास्त कर दिया गया, उ0प्र0 में योगी सरकार अपराध पर नियंत्रण करने की मंशा रखती है, अपराधो पर काबू करने के लिये पुलिस को छूट दी है, क्रूर एवं निरंकुश अपराधियों को पुलिस ‘‘ठोंक’’ दे की बात सार्वजनिक करती है.

पुलिस सरकार की मंशा समझ कर ठोंका ठोंक चिपटी है, वह अपराधियों की गिरफ्तारी करती है, तो मुठभेउ के रूप मंे गिरफ्तार किये गये कथित अपराधी की टांग में गोली मारती हे, वही उस मुठभेड़ को सही साबित करने के लिये किसी सिपाही के कंधे अथवा बांह में खरोच के निशान को बदमाश द्वारा चलाई गई गोली से घायल बताती है, ऐसी कई घटनाओं का खुलासा हो चुका है, चिकित्सीय परीक्षण मंे सिपाही की चोट गोली से नही लगी यह बात भी सामने आ चुकी है, उच्च न्यायालय भी पुलिस की ऐसी कार्यवाहियो से चिंतित है, लेकिन उ0प्र0 पुलिस एवं उ0प्र0 सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है।

इसी वर्ष उन्नाव के भांखीगांव की एक किशोरी ने भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर पर दुष्कर्म करने का आरोप लगाया, लेकिन पुलिस ने पीड़िता की शिकायत सुनने के बजाये विधायक को ही संरक्षित किया, पीड़िता के पिता को बेरहमी से इसलिये पीटा कि वह विधायक पर लगाये गये आरोपो को वापिस ले लें, पीड़िता के पिता की पुलिस अभिरक्षा में मौत हो गई, जनआक्रोश बढ़ा सी बी आई जांच प्रारम्भ हुई, तब कही असलियत सामने आई कि पुलिस ने विधायक सेंगर के इशारे पर ही उनके कृत्यो पर परदा डालने के लिये तमंचा बरामद दिखाकर पीड़िता के पिता को जेल भेजने की कहानी गढ़ी थी, आज विधायक एवं उनके सहयोगी पुलिस कर्मी जेल में हे.

ऐसा नहीं हैकि इस प्रकार की घटनाये येागी राज में ही हो रही है, ऐसी घटनाये सपा, बसपा कार्यकाल मंे भी हुई है, जो सार्वजनिक हुई कई माननीय आज भी जेल के सीखचों में कैद है, लेकिन ऐसी घटनायें इस बात का सबूत तो दे ही रही है, कि खाकी एवं खादी का एक बड़ा गठबंधन का जमाना चल रहा है।

पुलिस थानो में कथित अपराधियों एवं पीड़ितों के साथ बर्वरता दिखाती है, पलिस अभिरक्षा में तमाम लोगों की मृत्यु होजाने का खुलासा अक्सर होता रहता है, मकानो, जमीनों पर कब्जा करने वालो से वह अच्छा रसूक रखती है, वह कब्जा करने के विरूद्ध आवाज लगाने वालो को हड़का कर भगाती है, इसी लिय तालाबो नालो एवं अन्य कमजोर लोगों के मकानो जमीनों एवं कृषि योग खेतों पर कब्जे हो रहे हैं, लेकिन कही-कही एक भी भूमाफिया नही है, यह सरकार एवं प्रशासन दाबा करता है, लूट-डकैती, अपहरण, चोरी,हत्या ऐसी घटनाओं के समाचारों से अखबारो के पेज रोज भरे होते है, लेकिन शासन के पास भेजी गई, रिपोर्टो में इन अपराधो में कमी आई है, के आंकउ ही देखने को मिलते हैं.

जुआ, सट्टा, वेश्यावृत डग्गामार गाड़ियो की भरमार है, पुलिस इन पर लगाम लगाने के बजाये इसको सरंक्षण प्रदान करती है, उन्हें सुरक्षा प्रदान करती है, ऐसा इसलिये है कि तमाम हो चुकी पुलिस भर्तियां पिछली सरकारों ने अभ्यार्थियों से एक बड़ा सौदा कर की है, अभ्यर्थियों ने यदि कुछ देकर सफलता हांसिल की है, तो उन्हें वापिसी भी चाहिये है,और यह बापिसी अपराध कराकर अपराधियों से साठगांठ कर ही हो सकती है, इसमंे सफलता हासिल करने के लिये खादी का संरक्षण चाहिये होता है, जो भेंट दिये हुये बिना प्राप्त नही ंहोता, ऐसी पुलिस व्यवस्था से यह कल्पना कैसे की जा सकती है? कि वह आमजन को न्याय दे सकेगी।

ऐसा नही है, कि पुलिस विभाग मंे सभी एक तार है, यहां अच्छे एवं ईमानदार भी है, लेकिन अक्सर उन्हें अपनी योग्यता एवं ईमांदारी का प्रदर्शन नही करने दिया जाता, उन पर खादी एवं उसके संरक्षित माफियाओं का जबरदस्त दबाव होता हैं, जो इस दबाव को नही मानता तो उसे 24 घंटे अपना बोरिया विस्तरा बांधे रहने के लिये मजबूर होना पड़ता है।

पुलिस बसूली खुलकर कर रही है, नोएडा के सेक्टर 58 थाने के तत्कालीन प्रभारी इंसपेक्टर अनिल प्रताप एवं उनकी पुलिस टीम पर एक काल सैंटर के संचालक से लाखों की बसूली करने का आरोप लग चुका है, वह निलंबित भी किये जा चुके हें, नोयडा पुलिस की बसूली का रेट चार्ज व बसूली को लेकर एक बाराबंकी के सिपाही का भी बीडियो वायरल हो चुका है,

पिछले दिनों फर्रूखाबाद जनपद के मोहम्मदाबाद थाने के नगला दरियाव क्षेत्र के सैकड़ो ग्रामीणों ने जिसमें महिलाओं की संख्या अधिक थी, ने डी एम फर्रूखाबाद के पास पहुंच एसओजी टीम पर परिवार के यूवकों को अवैध रूप से हिरासत मंे रखने एवं उनके घरो मंे जबरन घुस कर लूट, तोड़-फोड़ एवं महिलाओं के साथ अभद्रता करने का आरोप लगाया है,

इस प्रकरण को जिलाधिकारी फर्रूखाबाद ने यहां के पुलिस अधीछक को स्वयं देखने का आदेश दिया है, कायमगंज क्षेत्र में एक दम्पति से लूट की हुई घटना के बाद वहां की पुलिस ने कई लुटेरों को पकड़ा उनसे लूट का सामान एवं धन बरामद किया, जिसमें लुटे दंपति का माल भी बरामद हुआ जिसकी वापिसी को लेकर कायमगंज थाने के तत्कालीन इंसपेक्टर और पीड़ित के मध्य आमने सामने एवं मोबाइल से बात हुई, लेकिन इंसपैक्टर द्वारा वायदा किये जाने के बाद भी दंपति को लुटा हुआ धन वापिस नही मिला, उसने इंसपैक्टर और अपने बीच मोबाइल पर हुई बार्ता जिसे उसने टेप किया था, फर्रूखाबाद के बरिष्ठ अधिकारियों को सुनाई, जिसका हल होना अभी बाकी है।

पुलिस पर महिलाओं की सुरक्षा की एक बड़ी जिम्मेदारी है, न्यायालयो से लेकर सरकारंे भी इस पर गंभीर हैं, लेकिन अकसर पुलिस पर बलात्कार की पीड़िता को सुरक्षा देने के बजाये उसे प्रताड़ित अपमानित करने के आरोप लगते रहते हैं, अब बाहर ही नही थानों के अंदर पुलिस कर्मियों द्वारा बलात्कार की घटनाये भी सामने आने लगी है, जो काफी चिंता का विषय हे, महिला के साथपुलिस कैसा व्यवहार करती है?

इस बात का विवेक हत्याकाण्ड की चश्मदीद गवाह सना जो विवेक तिवारी की सहकर्मी है। को 17 घंटे थाने में पुलिस के पहरे में बैठाये जाने और घटना को तोड़ मरोड़ने के लिये सना पर दबाव ड ाल एवं एक सादे कांगज पर पुलिस द्वारा उसके हस्ताक्षर कराने की घटना, सामने आ जाने से कही हद खुलासा हो चुका है, विवेक हत्याकाण्ड के मुख्य आरोपी सिपाही प्रशांत चैधरी एवं संदीप को जेल भेज दिया गया है,

http://hindmorcha.in/uttar-pradesh/38177

पुलिस का झूठ सामने आ चुका है, जन आक्रोश को थामने के लिये योगी ने ऐसी पुनरावृत्ति नहीं होगी का दाबा कर दिया है, विवेक की पत्नी कल्पना को 25 लाख एवं मां तथा बेटियों को 5-5 लाख की आर्थिक सहायता एवं विवेक की पत्नी को नौकरी तथा एक आवास देने की घोषणा कर विवेक के परिवार को दुःख से उवारने का कार्य किया है। हत्यारों को सजा दिलाने का वायदा भी किया है, इससे विवेक परिवार संतुष्ट भी हो सकता है, जन आक्रोश भी ठंडा पड़ सकता है, लेकिन पुलिस बर्बर और हिंसक न बन सके यह तो सुनश्चित नहीं होता.

सूचना क्रांति के दौर में पुलिस कर्मियों के चरित्र में सुधार न होना सभ्यसमाज के लिये खतरनाक है। देश में वाहय एवं आन्तरिक सुरक्षा एक बड़ा प्रश्न है, नक्सल और आतंकवाद दो बड़ी चुनौतिया है जिससे निबटने के लिये पुलिस को वैज्ञानिक और स्मार्ट बनाना बेहद आवश्यक है, सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस व्यवस्था मंे सुधार लाने के लिये राज्य सरकारों को कुछ दिशा निर्देश दिये हैं, उसे अब टालने की आवश्यकता नहीं है.

राज्य एवं केन्द्र सरकारों को भी एक योजना के तहत पुलिस व्यवस्था के सुधार के लिये पहल करनी चाहिये, इसके अभाव में लखनऊ ऐसी घटना की पुनरावृत्ति न हो इसकी गांरटी नही ली जा सकती, राजनेताओं को स्वयं शासन चलाने के तरीके में सुधारकरना पड़ेगा, उन्हें जन सेवा की भावना को लाना पड़ेगा दमन नीति को तिलांजली देनी पड़ेगी.

पुलिस का राजनीतिकरण करने एवं उसका दुर्पयोग करने की नीति को त्यागना होगा, पुलिस को छूट देने से पहले उसे शालीन बनाना होगा, पुलिस के कंधो परअनावश्यक डाला गया बोझ कम करना भी आवश्यक है, उन्हें बैल के समान हांकते रहना एक मुख्य कारण पुलिस का क्रूर होना भी है, इसे समझना होगा यह तभी संभव है, जब राजनेता अपनी खोई हुई इच्छाशक्ति को जगाने के लिये पहल करे, तभी पुलिस व्यवस्था में सुधार संभव हो सकता है, उसका चेहरा शालीन हो सकता है।

प्रदीप कुमार पाठक
(लेखक हिन्दमोर्चा के समूह सम्पादक एवं राष्ट्रीय प्रेस परिषद के महासचिव हैं)

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