प्रेमचन्द्र ने उपन्यास ‘सेवा सदन’ की आज से सौ साल पहले की थी रचना

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भारतीय राजनीति में जो सम्मान महात्मा गांधी का है, उसी प्रकार हिन्दी कथा साहित्य में उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द्र का है। आदि कवि वाल्मीक, उपमा गुरू कालीदास और महाकवि तुलसीदास जैसे महान और कालजयी रचनाकारों के समान ही सामाजिक सरोकारों के लोखक पे्रमचन्द ने भारतीयजनमानस को प्रभावित किया है।

वह मानते थे कि साहित्य समाज का दर्पण होने के साथ-साथ दीपक का भी काम करता है, जिसका उद्देश्य अन्याय, उत्पीड़न और आडंवर के अंधेरे को मिटाकर सद्भावना, सदाचार, साहस, समानता और सत्य के मार्ग को आलोकित करना है। प्रेमचन्द्र ने सामाजिक सरोकारों से ओत-प्रोत उपन्यास ‘सेवासदन’ की रचना आज से सौ साल पहले 1918 में की थी।

उर्दू भाषा में यही उपन्यास ‘बाजार-ए-हुस्न’ के नाम से 1919 में छपा। ‘सेवासदन’ में प्रेमचन्द ने नारी पराधीनता, वेश्याजीवन, दहेज प्रथा और मध्यम वर्ग की आर्थिक सामाजिक समस्याओं को प्रमुखता के साथ चित्रित करके उसका यथा संम्भव समाधान भी किया है। प्रेमचन्द भाषाशैली के साथ-साथ मनोविज्ञान के भी जादूगर थे। प्रेमचन्द की दूरदर्शिता काबिले तारीफ है।

आज से सौ साल पहले उन्होंने धर्म के ठेकेदारों को बेनकाव करते हुये ‘सेवासदन’ में लिखा है, ‘आजकल धर्म तो धूर्तों का अड्डा है’’ उस निर्मल सागर में एक से एक मगर मच्छ पड़े हुये हैं। भोले-भाले भक्तों को निगल जाना उनका काम है। लम्बी-लम्बी जटायें, लम्बे-लम्बे तिलक और लम्बी-लम्बी दाढ़ियांतो महज पांखड है, और लोगों को धोखा देने के लिये है।’’ प्रेमचन्द का यह वक्तव्य सौ साल बाद भी सामयिक है।

हरियाणा और गुजरात के दो चर्चित रसूखदार दोहरे-दोगले चरित्रवाले बाबाओं को जेल इसका सबल प्रमाण है। प्रसिद्ध आलोचक राम विलास शर्मा के अनुसार, ‘‘सेवा-सदन’’ की मुख्य समस्या भारतीय नारी की पराधीनता है। नारी समाज का सबसे दलित अंग राष्ट्रीय पराधीनता और घरेलू दासता, दोनों में पिसती हुई नारी-स्वाधीनता के लिये हाथ फैलाने लगी थी।

प्रेमचन्द ने सबसे पहले इस परिवर्तन को देखा था, उसका स्वागत किया और उसे बढ़ावा दिया। ‘सेवासदन’ के माध्यम से प्रेमचन्द्र केवल सामाजिक कुरीतियों और आडंबरों से ही रूबरू नहीं करते, बल्कि यथायोग्य तात्कालिक समाधान भी प्रस्तुत करते हैं।

News Source : Hindmorcha Digital Team Desk

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