पितरों के लिए किया गया कर्म ही ‘श्राद्ध’ है

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अजय कुमार,लखनऊ
भाग-दौड़ भरी जिंदगी में अक्सर कुछ ‘चीजें’ पीछे छूट जाती हैं तो कुछ विशेष मौकों को याद रखना हम भूल जाते हैं, जबकि सामाजिक और धार्मिक प्राणी होने के नाते ऐसी बातों और चीजों को हमेशा याद रखना चाहिए। अक्सर देखा जाता है कि आप अपने प्रिय मित्र या रिश्तेदार को या फिर घर वालों को उनके जन्मदिन-शादी की वर्षगांठ आदि मौकों पर बधाई नहीं देते हैं तो लोग नाराज हो जाते हैं, लेकिन वह ‘लोग’ क्या करें जिनकी वजह से आप जिंदगी में कई ‘मुकाम’ तो हासिल करते हैं,परंतु उनको याद नहीं रखते हैं।
बात हमारे पूर्वजों की हो रही है,जो भले आज इस दुनिया में नहीं हो,लेकिन उनके ऋण से कभी मुक्त नहीं हो सकते हैं। ऐसे महान पूर्वजों को हम भले भूल जाएं,लेकिन हमारे धर्म की खूबी है कि वह हमें पूर्वजों के ऋण से मुक्त नहीं होने देता है। इसी लिए धार्मिक तौर तरीकों से श्रद्धा पक्ष में अपने पूर्वजों को याद करके उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं।
एक तरह से श्राद्ध पक्ष पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धा का प्रतीक हैं। पितरों के निमित्त विधिपूर्वक जो कर्म श्रद्धा से किया जाता है, उसे ही ‘श्राद्ध’ कहते हैं। अबकी बार दो सितंबर से श्राद्ध शुरू हो रहे हैं। हिन्दू धर्म के अनुसार,प्रत्येक शुभ कार्य के प्रारम्भ में माता-पिता, पूर्वजों को नमस्कार या प्रणाम करना हमारा कर्तव्य है। हमारे पूर्वजों की वंश परम्परा के कारण ही हम आज यह जीवन देख रहे हैं, इस जीवन का आनंद प्राप्त कर रहे हैं।
इस धर्म में, ऋषियों ने वर्ष में एक पक्ष को पितृपक्ष का नाम दिया, जिस पक्ष में हम अपने पितरेश्वरों का श्राद्ध, तर्पण, मुक्ति हेतु विशेष क्रिया संपन्न कर उन्हें अर्ध्य समर्पित करते हैं। यदि किसी कारण से उनकी आत्मा को मुक्ति प्रदान नहीं हुई है तो श्राद्ध पक्ष में हम उनकी शांति के लिए विशिष्ट कर्म करते हैं। ब्रह्म पुराण ने श्राद्ध की परिभाषा इस प्रकार की है,’जो कुछ उचित काल, पात्र एवं स्थान के अनुसार उचित (शास्त्रानुमोदित) विधि द्वारा पितरों को लक्ष्य करके श्रद्धापूर्वकब्राह्मणों को दिया जाता है, वह श्राद्ध कहलाता है।’
श्राद्ध-कर्म में पके हुए चावल, दूध और तिल को मिश्रित करके पिण्ड बनाते हैं, पिण्ड का अर्थ है शरीर। यह एक पारंपरिक विश्वास है, जिसे विज्ञान भी मानता है कि हर पीढ़ी के भीतर मातृकुल तथा पितृकुल दोनों में पहले की पीढ़ियों के समन्वित ‘गुणसूत्र’ उपस्थित होते हैं। चावल के पिण्ड जो पिता, दादा, परदादा और पितामह के शरीरों का प्रतीक हैं, आपस में मिलकर फिर अलग बाँटते हैं। यह प्रतीकात्मक अनुष्ठान जिन जिन लोगों के गुणसूत्र(जीन्स) श्राद्ध करने वाले की अपनी देह में हैं, उनकी तृप्ति के लिए होता है।
हमारे धर्म ग्रन्थों में भी दैनिक पंच यज्ञों में पितृ यज्ञ को खास बताया गया है। इसमें तर्पण और समय-समय पर पिण्डदान भी सम्मिलित है। पूरे पितृपक्ष भर तर्पण आदि करना चाहिए। इस दौरान कोई अन्य शुभ कार्य या नया कार्य अथवा पूजा-पाठ अनुष्ठान सम्बन्धी नया काम नहीं किया जाता। साथ ही श्राद्ध नियमों का विशेष पालन करना चाहिए। परन्तु नित्य कर्म तथा देवताओं की नित्य पूजा जो पहले से होती आ रही है, उसको बन्द नहीं करना चाहिए।
जन्म एवं मृत्यु का रहस्य अत्यन्त गूढ़ है। वेदों में, दर्शन शास्त्रों में, उपनिषदों एवं पुराणों आदि में हमारे ऋषियों-मनीषियों ने इस विषय पर विस्तृत विचार किया है। श्रीमदभागवत में भी स्पष्ट रूप से बताया गया है कि जन्म लेने वाले की मृत्यु और मृत्यु को प्राप्त होने वाले का जन्म निश्चित है। यह प्रकृति का नियम है। शरीर नष्ट होता है मगर आत्मा कभी भी नष्ट नहीं होती है। वह पुनः जन्म लेती है और बार-बार जन्म लेती है। इस पुर्नजन्म के आधार पर ही कर्मकाण्ड में श्राद्धदि कर्म का विधान निर्मित किया गया है।
श्राद्ध के लिए निश्चित दिन से पूर्व विहित ब्राह्मणों को ‘पितृ-श्राद्ध’ तथा ‘वैश्व-देव-श्राद्ध’ के लिए निमंत्रित करें। पितृ-श्राद्ध के लिए सामर्थ्यानुसार अयुग्म तथा वैश्व-देव-श्राद्ध के लिए युग्म ब्राह्मणों को निमंत्रित करना चाहिए। श्राद्ध का दिन निर्धारित करके उस दिन पूर्वजों का आवाहन, पूजन, नमस्कार के उपरान्त तर्पण किया जाता है। जल में दूध,जौ, चावल, चन्दन डाल कर तर्पण कार्य में प्रयुक्त करते हैं। मिल सके, तो गंगा जल भी डाल देना चाहिए। तृप्ति के लिए तर्पण किया जाता है।
स्वगर्स्थ आत्माओं की तृप्ति किसी पदार्थ से, खाने-पहनने आदि की वस्तु से नहीं होती, क्योंकि स्थूल शरीर के लिए ही भौतिक उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है। मरने के बाद स्थूल शरीर समाप्त होकर, केवल सूक्ष्म शरीर ही रह जाता है। सूक्ष्म शरीर को भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी आदि की आवश्यकता नहीं रहती, उसकी तृप्ति का विषय कोई, खाद्य पदार्थ या हाड़-मांस वाले शरीर के लिए उपयुक्त उपकरण नहीं हो सकते। सूक्ष्म शरीर में विचारणा, चेतना और भावना की प्रधानता रहती है, इसलिए उसमें उत्कृष्ट भावनाओं से बना अन्तःकरण या वातावरण ही शान्तिदायक होता है।
गौरतलब हो, हमारे धर्मशास्त्रों में सूत्रकाल(लगभग ई. पू. 600) से लेकर मध्यकाल तक सभी लोगों ने श्राद्ध की महत्ता एवं उससे उत्पन्न कल्याण की महत्ता बताई हैं। ऐसी मान्यता है कि पुराने काल में मनुष्य एवं देव इसी लोक में रहते थे। देव लोग यज्ञों के कारण (पुरस्कार स्वरूप) स्वर्ग चले गये, किन्तु मनुष्य यहीं पर रह गये। जो मनुष्य देवों के समान यज्ञ करते हैं वे परलोक (स्वर्ग) में देवों एवं ब्रह्मा के साथ निवास करते हैं। तब (मनुष्यों को पीछे रहते देखकर) मनु ने उस कृत्य को आरम्भ किया जिसे श्राद्ध की संज्ञा मिली है, जो मानव जाति को श्रेय (मुक्ति या आनन्द) की ओर ले जाता है। इस कृत्य में पितर लोग देवता (अधिष्ठाता) हैं, किन्तु ब्राह्मण लोग (जिन्हें भोजन दिया जाता है) आहवानीय अग्नि (जिसमें यज्ञों के समय आहुतियाँ दी जाती हैं) के स्थान पर माने जाते हैं।
शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध श्राद्धकर्ता को प्रयास करके दक्षिण की ओर ढालू भूमि खोजनी चाहिए, जो कि पवित्र हो और जहाँ पर मनुष्य अधिकतर न जाते हों। उस भूमि को गोबर से लीप देना चाहिए, क्योंकि पितर लोग वास्तविक स्वच्छ स्थलों, नदी-तटों एवं उस स्थान पर किये गए श्राद्ध से प्रसन्न होते हैं, जहाँ पर लोग बहुधा कम ही जाते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि श्राद्ध स्थल चतुर्दिक से आवृत, पवित्र एवं दक्षिण की ओर ढालू होना चाहिए। बहरहाल,अबकी से दो दिन 01 और 02 सितम्बर की पूर्णिमा है। इस लिए श्राद्ध की शुरूआत भी कहीं आज से तो कई जगह कल से शुरू होना बताया जा रहा है।

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