महिलाओं के लिए अभिशाप बन गया लाॅकडाउन, अनचाहें गर्भ, बाल विवाह, उत्पीड़न के मामलोेेें में बेतहाशा वृद्धि

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अजय कुमार,लखनऊ
लाॅक डाउन के दौरान फिल्म अभिनेत्री करीना कपूर और अनुष्का शर्मा ने माॅ बनने की गुड न्यूज क्या दी,उनके फैंस खुशी से झूम उठे,लेकिन अफसोस की बात यह है कि देश की सभी महिलाओं की किस्मत करीना और अनुष्का की तरह नहीं हैं। लाॅक डाउन के दौरान तमाम ऐसी महिलाओं का भी दर्द सामने जो न चाहते हुए भी माॅ बनने को मजबूर हो गई हैं। लाॅक डाउन के दौरान गर्भनिरोधक तरीके लिए दवाएं नहीं मिलने और कोरोना के चलते गर्भपात के लिए अस्पताल नहीं जा पाने के कारण इन महिलाओं के सामने गर्भ धारण की समस्या आई है।
इसी लिए ऐसा महसूस किया जा रहा है कि दुनियाभर में कोरोना वायरस को मात देने के लिए लगाया गया लाॅक डाउन महिलाओं के सामने नये-नये तरह की मुश्किलें खड़ी कर रहा हैं। खासकर महिलाओं के शारीरिक शोषण, बाल विवाह और लाॅकडाउन के समय गृर्भवती महिलाओं की संख्या में जबर्दस्त बढ़ोत्तरी देखने को मिली है। वहीं दूसरी तरफ ऐसी भी खबरें आ रही हैं कि कोरोना ने पुरूषों की प्रजनन क्षमता को भी नुकसान पहुंचाया है।
स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी तमाम एजेंसियों के सर्वे बता रहे हैं कि दुनिया भर में कोरोना संक्रमण रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन भले ही कई मायनों में प्रकृति के लिए वरदान साबित हो रहे हो लेकिन इसके कुछ बुरे नतीजे भी आ सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि लॉकडाउन के चलते निम्न व मध्यम आय वाले देशों में करीब पांच करोड़ महिलाएं गर्भनिरोधकों के इस्तेमाल से वंचित रहने के कारण दुनिया भर में करीब 4.7 करोड़ अनचाहे गर्भधारण के मामले सामने आ सकते हैं, जिसके चलते दुनिया की आबादी में अचानक बढ़ोत्तरी देखने को मिल सकती हैै। गर्भ निरोधक दवाएं उपलब्ध नहीं हो पाने के चलते सिर्फ भारत में ही 13 लाख महिलाएं अरचाहे रूप से गर्भवती हो गई हैं।
इस बारे में जच्चा-बच्चा अस्पताल के चिकित्सकों का कहना है कि उनके पास भी ऐसे बहुत सारे ऐसे फोन आए,जो प्रेग्नेंसी के सवालों से जुड़े हुए थे। कई फोन अबाॅर्शन कराने को लेकर भी थे। दरअसल प्रेग्नेंसी के मामले बढ़ने की एक वजह यह भी थी कि कई अस्पतालों को कोविड हाॅस्पिटल बना दिया गया। डाॅक्टर और नर्स कोविड ड्यूटी में लगा दिए गए। हालांकि ऐसा करना जरूरी भी था, पर इससे अन्य बीमरियों के इलाज पर असर पड़ा। निजी अस्पतालों में पहले महीने में कई ओपीडी बंद रहीं और क्लिनिक बंद हो गए, जिससे लोगों के पास अपना इलाज कराने का कोई तरीका नहीं बचा।
बात यहीं तक सीमित नहीं है। ऐसे मामले भी सामने आ रहे हैं, जब महिलाएं यौन संबंध स्थापित करते समय सुरक्षित तरीके नही अपनाने पाईं तो कई ने गर्भपात करने के लिए असुरक्षित तरीका अपनाया, जिसमें महिलाओं ने गर्भपात करने के लिए घरेलू उपाय अपनाएं। इससे उनको इंफेक्शन हो गया। कई लोगों का तो गर्भपात भी नहीं हो पाया और साइड इफेक्ट्स हो गए। दरअसल, कोरोना के दौरान सरकार का पूरा ध्यान लोगों का खाना, रहना, दवाइयां और कपड़े उपलब्ध कराने पर रहा।
लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि किसी भी सिचुएशन में डिलीवरी नहीं रूक सकती और गर्भपात भी एक तय समय सीमा में होना जरूरी है। यूनिसेफ का कहना है कि इस साल 11 मार्च से 16 दिसंबर के बीच दुनियाभर में 11 करोड़ 60 लाख बच्चे पैदा होंगे। दूसरे देशों के मुकाबले इस साल सबसे ज्यादा 2.1 करोड़ बच्चे भारत में पैदा होंगे। चीन दूसरे पायदान पर होगा।
यूनीसेफ के मुताबिक, नाइजीरिया में 60.4 लाख, पाकिस्तान में 50 लाख और इंडोनेशिया में 40 लाख बच्चे पैदा होंगे। अमेरिका बच्चों के जन्म की अनुमानित संख्या के मामले में छठे स्थान पर हो सकता है। यहां इस दौरान 30 लाख से ज्यादा बच्चों के पैदा होने का अनुमान हैं। एक शोध के मुताबिक 114 निम्न और मध्यम आय वाले देशों में 45 करोड़ महिलाएं गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल करती हैं, जबकि लॉकडाउन के चलते निम्न और मध्यम आय वाले देशों में 4.70 करोड़ महिलाएं आधुनिक गर्भनिरोधकों के इस्तेमाल से वंचित हैं। इससे लैंगिक भेदभाव के 3.10 करोड़ अतिरिक्त मामले भी सामने आ सकते हैं।
महिलाओं के अनचाहे गर्भपात ग्रहण करने के साथ-साथ यूएनएफपीए ने यह भी रिपोर्ट दी है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा और अन्य प्रकार के शोषण के मामले भी तेजी से बढ़ने का खतरा है। सेक्स वर्कस पर भी कोरोना का बुरा असर हो रहा है। एक तरफ सेक्स वर्कस आर्थिक तंगी के चलते अपना देह व्यापार का धंधा बंद नहीं कर पा रही हैं तो दूसरी तरफ लाॅक डाउन के समय गर्भनिरोधक गोलियां आदि की उपलब्धता नहीं मिल पाने के कारण तमाम सेक्स वर्कस अनचाहे रूप से गर्भवती हो गई हैं।
यूएनएफपीए के आंकडे उस भयावह प्रभाव को दिखाते हैं जो पूरी दुनिया में महिलाओं और लड़कियों पर पड़ सकते हैं। क्योंकि कोरोना महामारी भेदभाव को गहरा कर रही है। साथ ही लाखों और महिलाएं-लड़कियां परिवार नियोजन की अपनी योजनाओं को पूरा कर पाने और अपनी देह तथा स्वास्थ्य की रक्षा कर पाने में नाकाम हो सकती हैं।
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के मुताबिक महामारी के इस वक्त में महिलाओं के खतने (एफजीएम) और बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं के खात्मे की दिशा में चल रहे कार्यक्रमों की गति भी प्रभावित हो रही है। इससे एक दशक में एफजीएम के अनुमानित 20 लाख और मामले सामने आएंगे। इसके अलावा अगले 10 साल में बाल विवाह के एक करोड़ 30 लाख मामले सामने आ सकते हैं।
लाॅकडाउन के चलते लोगों की आर्थिक स्थिति काफी प्रभावित हुई है। इसके कारण देश के दूरदराज इलाकों में बाल विवाह की घटनाओं में भी वृद्धि देखने को मिल रही है। बाल संरक्षण से जुड़ी संस्था चाइल्डलाइन ने इस वर्ष मई से जुलाई के बीच पूरे देश में कुल 92 हजार 203 प्रकरणों का रिकार्ड तैयार किया। इसमें 5 हजार 58 मामले बाल विवाह से संबंधित हैं। पिछले दिनों महाराष्ट्र में मराठवाड़ा अंचल के लातूर जिले में बाल विवाह से जुड़ी एक चैंकाने वाली घटना सामने आई।
जहां पंद्रह वर्ष की एक बच्ची का विवाह एक पचास वर्षीय विधुर से किया जा रहा था। हालांकि, एक सामाजिक संगठन की मध्यस्थता से यह विवाह रोक दिया गया। साथ ही इस विवाह आयोजन के लिए जिम्मेदार पक्षों के विरुद्ध प्रकरण भी दर्ज किया गया है। पर, राज्य में बाल विवाह से जुड़ी यह अकेली घटना नहीं है। महाराष्ट्र में लॉकडाउन के दौरान के आंकड़े देखें तो ऐसे प्रकरणों की सैकड़ों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है,यह और बात है कि महाराष्ट्र सरकार बाल विवाह की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि होने की बात से इंकार कर रही है। महाराष्ट्र राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के पूर्व सदस्य संतोष शिंदे बताते हैं कि इसी दौरान महाराष्ट्र में करीब दो सौ के करीब बाल विवाह के प्रकरण सामने आए हैं।
गौरतलब हो बाल विवाह के तमाम प्रकरण सामाजिक संगठनों के हस्तक्षेप से उजागर हुए हैं। प्रश्न है कि जिन इलाकों में इस मुद्दे पर सामाजिक संगठन सक्रिय नहीं हैं वहां इस कुरीति पर नियंत्रण करने के लिए प्रशासिनक स्तर पर क्या प्रयास किए गए होंगे। जब सभी सरकारी एजेंसिया महामारी को रोकने में व्यस्त हैं तो इस तरह की घटनाओं की निगरानी करने और इन्हें रोकने के मामले में की जा रही लापरवाही से सामाजिक जीवन काफी प्रभावित हो रहा है।
बाल विवाह के मामलों में आई अचानक तेजी के संबंध में सामाजिक परिवर्तन के लिए कार्य करने वाले कई कार्यकर्ताओं का मानना है कि कोरोना काल में लॉकडाउन के साथ ही छोटे बच्चों के स्कूल बंद कर दिए गए। इससे उनकी शिक्षा बंद हो गई। वहीं, मजदूरी से कमाई करने वाले अधिकतर माता-पिता भी बेरोजगार हो गए। इससे कई परिवारों के लिए दो जून की रोटी मुश्किल हो गई। लिहाजा, इनमें से कई परिवारों ने बाल विवाह के माध्यम से छोटी लड़कियों को उनकी जिम्मेदारियों से मुक्त करने की योजना बनाई और उन्हें बाल विवाह की ‘आग’ कें धकेला दिया गया।
बात पुरूषों की कि जाए तो कोरोना सिर्फ फेफड़े ही नहीं बल्कि शरीर के दूसरे महत्वपूर्ण अंगों पर भी असर डाल रहा है। एक अध्ययन में साबित हुआ है कि कोरोना से पीड़ित कुछ पुरूषों में यौन हार्माेन (टेस्टोस्टेराॅन) की कमी पाई गई है। इस वजह से पीड़ित युवाओं में प्रजनन क्षमता प्रभावित होने का खतरा है। इसलिए विशेषज्ञ कोरोना पुरूष मरीजों के ठीक होेने के बाद भी फाॅलोअप की जरूरत बता रहे हैं।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डाॅक्टर कहते हैं कि लंबे समय तक फाॅलोअप करने के बाद पता चल पाएगा कि प्रजनन क्षमता पर कोरोना कितना असर डाला रहा है। संक्रमित कुुछ मरीजों में परेशानी देखी गई है। कोविड-19 से पीड़ित युवाओं में प्रजनन स्वास्थ्य को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। एम्स के डाॅक्टरों ने राष्ट्रीय गै्रंड राउंड-5 में बताया कि कोरोना से पीड़िता कुछ मरीजों में वायरल आॅर्काइटिस की बीमारी देखी जा चुकी है। इसके कराण अंडकोष में सूजन होने लगती है।
मेडिसन विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डाॅ. नीरज निश्चल ने कहा कि कोविड-19 से पीड़ित 81 पुरूषों पर किए शोध में प्रजनन क्षमता प्रभावित होेेने पता चला है। इनमें टेस्टोस्टेराॅन हार्मोन कम हो गया था। कोरोना वायरस एसीई-2 (एंजियोंटेंसिन कन्वर्टिंग एंजाइम-2) प्रोटीन पर अटैक करता है। इसलिए फेफड़ा सहित शरीर के उन हिस्सों पर संक्रमण अधिक देखा जा है, जिसमें एसीई-2 मौजूद होता है।

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