राजनाथ सिंह की रूस यात्रा रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पर चीन के ख़िलाफ़ भविष्य में रूस भारत का खुलकर साथ देगा यह उम्मीद करना जल्दबाजी

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सर्वेश त्रिपाठी

सर्वेश त्रिपाठी
सोमवार से अपनी तीन दिवसीय विदेश यात्रा के दौरान रक्षामंत्री राजनाथ सिंह रूस के दौरे पर है । अपनी यात्रा के आरंभ में रक्षामंत्री ने अपने ट्वीटर हैंडल से इस आशय की जानकारी दी। रक्षामंत्री द्वारा भविष्य के मद्देनजर इस यात्रा की उपयोगिता को रेखांकित करते हुए कहा गया कि वर्तमान यात्रा दोनों देशों के आपसी सम्बन्धों के साथ साथ रक्षा और रणनीतिक साझेदारी को और भी गहरा करेगी। ग़ौरतलब है कि इसी यात्रा के दौरान अन्य कार्यक्रमों के अतिरिक्त रक्षामंत्री द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी पर सोवियत रूस के विजय की पचहत्तरवीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित भव्य सैन्य परेड में भी सम्मिलित होंगे।
जैसा कि अतीत में सोवियत रूस भारत का एक स्वाभाविक सहयोगी देश रहा है । वर्तमान में भी सांस्कृतिक , आर्थिक , सैन्य और रणनीतिक साझेदार के रूप दोनों देश एक दूसरे के परस्पर ईमानदार सहयोगी है। राजनाथ सिंह द्वारा यात्रा के दौरान यह भी कहा गया कि ” कॉविड महामारी के दौरान भारत की यह प्रथम औपचारिक यात्रा दोनों देशों के मध्य विशिष्ट मित्रता को प्रकट करता है।”
चीन के साथ सीमा विवाद के परिप्रेक्ष्य में यदि देखे तो इस यात्रा की गंभीरता स्पष्ट हो जाती है । हालांकि रूस – इंडिया – चीन के मध्य वर्चुअल बैठक में रूस ने यह स्पष्ट कहा कि भारत और चीन अपने मतभेदों को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने में सक्षम है और दोनों ऐसा कर भी रहे है। फ़िलहाल रक्षामंत्री की यात्रा का उद्देश्य उन रक्षा सौदों को गति प्रदान करना है जो इस महामारी के चलते सुस्त गति में है।
गौरतलब है कि भारत रूस से पूर्व में किए गए सौदे के तहत एस – 400 डिफेंस सिस्टम शीघ्र ही पाने का इच्छुक है। जैसा कि कुछ सूत्रों का दावा है कि रूस ने इस सिस्टम की डिलीवरी की तारीख आगे बढ़ा दी है ,जो कि भारत के लिहाज से चिंताजनक है। इसी के साथ सुखोई – 30 एम के आई , मिग – 29 , टी – 90 टैंक और किलो क्लास सबमरीन के उपकरणों की त्वरित आपूर्ति भी भारत के लिए अति आवश्यक है।
पूर्व में यह कहा जा रहा था कि भारतीय रक्षामंत्री चीन के रक्षामंत्री से भी भेंट करेंगे लेकिन बाद में यह जानकारी प्राप्त हुई कि चीन रक्षामंत्री से मुलाकात का कार्यक्रम नहीं है। हालांकि राजनाथ सिंह की रूस के उप प्रधानमंत्री यूरी बोरिसोव से मुलाकात काफी सफल रही। राजनाथ सिंह द्वारा अपने ट्वीटर हैंडल से यह सूचना दी गई कि “रूस की तरफ़ से सभी भारतीय प्रस्तावों पर सकारात्मक उत्तर मिला । मैं अपनी बातचीत से पूर्णतया संतुष्ट हूं। मैं पूर्ण विश्वास के साथ कह सकता हूं कि भारत और रूस के मध्य पारम्परिक सम्बन्ध सदैव मजबूत रहेंगे।”
इस प्रकार हम देख सकते है कि कोरोना महामारी और चीन के साथ तनावपूर्ण स्थिति में भारतीय रक्षामंत्री की चीन की आधिकारिक यात्रा भले ही स्पष्ट तौर पर कहा जाए लेकिन यह कूटनीतिक महत्व का भी है। विगत एक दशक से चीन और रूस के मध्य संबंध बहुत मजबूत हुए है । इस लिहाज से भारत की यह स्वाभाविक इच्छा बनती है कि तनाव अधिक बढ़ने पर अथवा युद्ध की आशंका के दौरान रूस का दबाव चीन पर बने और लद्दाख में चीन की हरकतें कम हो।
किन्तु विगत एक दशक में बदले चीन रूस के सबंधों के मद्देनजर यह उम्मीद करना जल्दबाजी होगी कि चीन के ख़िलाफ़ भविष्य में रूस भारत का खुलकर साथ देने की स्थिति में होगा। रूस अपनी खोई ताकत को पाने के लिए चीन को एक मजबूत साझीदार के रूप में लेता है। भारत भी इस तथ्य को भी समझना चाहिए। हालांकि भारत के अधिकतर सैन्य उपकरण रूस में निर्मित है अतः भविष्य में भारत द्वारा किसी भी तरह के सैन्य कार्यवाही में रूस के तकनीक सहयोग की भूमिका अति महत्वपूर्ण होगी।

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