“राम के पाद”

0
154
चपल चन्द्र धर धवलचन्द्रिका विहग विहङ्गम कूज रहे हैं
दिग्वस्त्रों में भ्रमित निशाचर श्वेतचन्द्रिका पूज रहे हैं
कलरव आतुर गङ्ग सरित जल इन्दु धरे हृद सोह रहे हैं
व्योम सहित सुन्दर रजनीकर तिमिर जीवमन मोह रहे हैं
मञ्जुल सून मुकुल अति आतुर कान्त प्रभात विचार रहे हैं
मानस लोक विचार किये सब राम के पाद पखार रहे हैंll
सुन्दर रूप धरे नव अम्बुद इन्दु सखा संग खेल रहे हैं
मध्यम वात सुगन्ध लिए फिर सुप्त धरा मन मेल रहे हैं
शीतल ताप सदा मनभावन कौशिक चित्त उकेर रहे हैं
स्थलपद्म गिरे नभ शीत से पुष्पज अंक सहेज रहे हैं
कुक्कुट व्याकुल हैं मन में कपि सुंदर रूप विचार रहे हैं
मानस लोक विचार किये सब राम के पाद पखार रहे हैंll
गृहपाल बने नक्षत्र सभी सब चौर विधान को जान रहे हैं
दीपक तैल को अंक भरे वर्ती मुख माध्यम पान रहे हैं
अब मार्ग किये विश्राम सभी नवप्रात की राह निहार रहे हैं
आपण सर्व विराम लिए अब ग्राहक वृन्द पुकार रहे हैं
जनमानस स्वप्न में मुग्ध हुए मन मंदिर मूर्ति विचार रहे हैं
मानस लोक विचार किये सब राम के पाद पखार रहे हैंll
सुन्दर सौम्य सुशील सदा शिशु मात के अंक में खेल रहे हैं
शावक कल्पित धावक हो निज भ्रात को पंक में मेल रहे हैं
अण्डज सिंधु लिए कर में निज गात को नित्य सहेज रहे हैं
शैल लिए शतकोटि शिला निज कन्दर सूर्य सहेज रहे हैं
कम्बु हृदय अब धीर धरे स्वशरीर का नाद विचार रहे हैं
मानस लोक विचार किये सब राम के पाद पखार रहे हैंll

शुचिव्रत मिश्र ‘भृगु’ द्बारा रचित

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.